श्रीफल की विशेष श्रृंखला ‘दस दिन–दस परिवार’ में आज मिलिए दिगंबर जैन सोशल ग्रुप फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोहर झांझरी के परिवार से।
दशलक्षण महापर्व के दस दिन झांझरी परिवार के लिए केवल पूजा-पाठ या धार्मिक आयोजनों में सहभागिता का समय नहीं होते, बल्कि पूरे परिवार की दिनचर्या को संयम, शुद्ध आहार, त्याग और आत्मचिंतन से जोड़ने का अवसर बनते हैं। इन दिनों परिवार के सदस्य अपनी उम्र, स्वास्थ्य और व्यावसायिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग नियम लेते हैं, लेकिन सभी का प्रयास रहता है कि धर्म उनके दैनिक जीवन और व्यवहार का हिस्सा बने।
श्रीफल समूह की संपादक रेखा जैन से विशेष बातचीत में मनोहर झांझरी की बहू रितु झांझरी ने परिवार की दशलक्षण से जुड़ी दिनचर्या साझा की। उन्होंने बताया कि इस बार उन्होंने पहली बार पूरे दस दिनों तक एकासन करने का संकल्प लिया है। पहले कभी उन्होंने लगातार दस दिन एकासन नहीं किया था, लेकिन पर्व के धार्मिक वातावरण और परिवार से मिले संस्कारों ने उन्हें यह नियम लेने की प्रेरणा दी।
रितु ने बताया कि एकासन के कारण उनका पूरा दिन अधिक व्यवस्थित और धर्ममय हो गया है। सुबह जल्दी उठकर घर के आवश्यक कार्य पूरे करने के बाद वे पूजा के लिए मंदिर जाती हैं। दिनभर पूजा-पाठ, माला फेरने, जाप और ध्यान में समय व्यतीत होता है। इससे मन में शांति बनी रहती है और घर का वातावरण भी सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक शांत तथा सकारात्मक हो जाता है।
मंदिर दर्शन के बाद ही भोजन
झांझरी परिवार की प्रमुख विशेषता यह है कि घर के सदस्य मंदिर दर्शन के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं। रितु के पति वर्षभर इस नियम का पालन करते हैं। वे जिनेंद्र भगवान के दर्शन किए बिना भोजन नहीं करते। दशलक्षण पर्व के दौरान इस नियम के साथ खान-पान की शुद्धता और अन्य धार्मिक मर्यादाओं का भी अधिक सावधानी से पालन किया जाता है।
परिवार के मुखिया मनोहर झांझरी भी दशलक्षण के दस दिनों में संतों के सान्निध्य, पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियों से जुड़े रहते हैं। रितु ने बताया कि परिवार में उनके ससुरजी के धार्मिक और सामाजिक जीवन का प्रभाव सभी सदस्यों पर दिखाई देता है। महाराजजी और माताजी के सान्निध्य में धर्म आराधना तथा समाज के धार्मिक आयोजनों में सहभागिता परिवार की परंपरा का हिस्सा है।
सीमित आहार और बाहर के भोजन का पूर्ण त्याग
दशलक्षण पर्व के दौरान परिवार में रात्रि भोजन का त्याग रहता है। इसके साथ ही भोजन में भी सीमित वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। पांच सब्जियों अथवा निश्चित खाद्य पदार्थों को ही ग्रहण किया जाता है और बाकी का त्याग कर दिया जाता है। इसी तरह एक फल को छोड़कर अन्य फलों का त्याग भी किया जाता है।
परिवार के सभी सदस्य दस दिनों तक बाहर का कुछ भी नहीं खाते। बाजार, होटल या पैकेटबंद भोजन से पूरी दूरी रखी जाती है। घर में तैयार शुद्ध, सात्विक और मर्यादित भोजन ही ग्रहण किया जाता है। रितु का कहना है कि इस सीमित आहार से व्यक्ति केवल भोजन पर नियंत्रण नहीं करता, बल्कि अपनी इच्छाओं और स्वाद की आसक्ति को भी कम करने का प्रयास करता है।
सोशल मीडिया का भी दस दिनों के लिए त्याग
रितु झांझरी ने अपनी दिनचर्या में केवल भोजन और सुविधाओं का ही नहीं, बल्कि डिजिटल माध्यमों का भी त्याग जोड़ा है। उन्होंने बताया कि दशलक्षण पर्व के दस दिनों में वे व्हाट्सएप और फेसबुक का उपयोग बंद कर देती हैं। इससे उनका ध्यान बाहरी गतिविधियों से हटकर पूजा, पाठ, जाप और आत्मचिंतन पर अधिक केंद्रित हो जाता है।
उनका मानना है कि सोशल मीडिया का त्याग करने से मन अनावश्यक संदेशों, चर्चाओं और सूचनाओं से दूर रहता है। जो समय सामान्य दिनों में मोबाइल पर व्यतीत होता है, वह इन दिनों धर्म आराधना में लगाया जा सकता है। यह छोटा-सा नियम मन को शांत रखने में सहायक बनता है।
पुणे में नौकरी कर रहा बेटा भी निभा रहा आहार की मर्यादा
बातचीत में रितु ने बताया कि उनका बेटा पुणे में नौकरी करता है। काम का समय दोपहर एक बजे से रात ग्यारह बजे तक होने के कारण उसके लिए परिवार जैसी पूरी दिनचर्या और समय पर भोजन का नियम निभाना आसान नहीं है। कार्यालय में भोजन देर से मिलता है और काम के बीच बाहर जाकर मंदिर दर्शन करना भी हमेशा संभव नहीं हो पाता।
इसके बावजूद वह ऐसे होटल या स्थान पर भोजन नहीं करता, जहां मांसाहारी भोजन बनता हो। व्यावसायिक परिस्थितियों के कारण वह दशलक्षण के सभी नियम पूरी तरह नहीं निभा पाता, लेकिन भोजन की शुद्धता और जैन संस्कारों के प्रति सजग रहता है। समय मिलने पर मंदिर दर्शन भी करता है।
रितु ने कहा कि बच्चों को दूर बैठकर केवल नियम बताना पर्याप्त नहीं होता। उनकी परिस्थितियों को समझते हुए जितना संभव हो, उतना धर्म से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उनके बेटे का मांसाहार बनने वाले स्थान का भोजन पूरी तरह छोड़ना भी परिवार से मिले संस्कारों का ही परिणाम है।
तीन पीढ़ियों में अलग-अलग रूप में धर्म पालन
झांझरी परिवार में दशलक्षण पर्व का प्रभाव तीन पीढ़ियों में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है। मनोहर झांझरी संतों के सान्निध्य, समाज सेवा और धर्म प्रभावना से जुड़े हैं। उनके पुत्र वर्षभर मंदिर दर्शन के बाद ही भोजन करने का नियम निभाते हैं। बहू रितु एकासन, सीमित आहार, जाप, ध्यान और सोशल मीडिया त्याग के माध्यम से साधना कर रही हैं, जबकि बाहर नौकरी कर रहा पोता अपनी परिस्थितियों के अनुरूप भोजन की शुद्धता और मंदिर दर्शन के संस्कार को बनाए रखने का प्रयास करता है।
परिवार की दिनचर्या यह संदेश देती है कि धर्म पालन सभी के लिए एक जैसा होना आवश्यक नहीं है। कोई एकासन कर सकता है, कोई रात्रि भोजन का त्याग, कोई दर्शन के बाद भोजन करने का नियम और कोई बाहर रहकर भी अभक्ष्य तथा अशुद्ध भोजन से दूरी बनाए रख सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि हर सदस्य अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार धर्म को जीवन में स्थान दे।
दस दिन मन और घर दोनों में लाते हैं शांति
रेखा जैन से बातचीत में रितु झांझरी ने कहा कि दशलक्षण के दौरान उनका मन सामान्य दिनों की तुलना में अधिक शांत रहता है। पूजा-पाठ, माला, जाप और ध्यान के कारण दिन व्यर्थ की बातों और भागदौड़ में नहीं निकलता। परिवार के सभी सदस्य जब धर्म और संयम से जुड़े रहते हैं, तो घर का वातावरण भी स्वतः शांत और सकारात्मक बन जाता है।
झांझरी परिवार के लिए दशलक्षण महापर्व दस दिनों का धार्मिक आयोजन भर नहीं है। यह परिवार को अपनी आदतों की समीक्षा करने, आहार को मर्यादित बनाने, मोबाइल और बाहरी आकर्षणों से दूरी रखने तथा नई पीढ़ी तक धर्म के संस्कार पहुंचाने का अवसर है। यहां धर्म केवल मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि भोजन, समय, व्यवहार और जीवनशैली में दिखाई देता है।
श्रृंखला का उद्देश्य
श्रीफल की इस विशेष “दस दिन–दस परिवार” श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व के दिनों में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, आम दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा इस पर्व का परिवार और जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
कल मिलेंगे एक और परिवार से, जो बताएगा कि दशलक्षण पर्व उनके घर में किस तरह आत्मशुद्धि, संस्कार और अनुशासन का वातावरण बनाता है।





