मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री 108 उदारसागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में धन-संपत्ति मिलना ही सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं है। संपत्ति का धर्म, परोपकार और आत्मकल्याण के कार्यों में सदुपयोग करना ही उसकी वास्तविक सार्थकता है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक अनुष्ठान, विधान, पूजन और मांगलिक आयोजनों में सहभागी बनने का अवसर पुण्य का निमित्त है। ऐसे अवसरों को श्रद्धा और समर्पण के साथ स्वीकार करना चाहिए।

धन से अधिक महत्वपूर्ण है भावना

आचार्यश्री ने कहा कि अनेक लोगों के पास पर्याप्त धन-संपत्ति एवं भौतिक सुख-सुविधाएं होती हैं, लेकिन धार्मिक कार्यों में उनकी रुचि अपेक्षित नहीं होती। वहीं सीमित साधनों वाला व्यक्ति भी अपनी श्रद्धा, भक्ति और उत्साह से धर्मप्रभावना में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक कार्यों की सार्थकता केवल धन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि व्यक्ति की भावना, आस्था और पुण्य के संयोग से जुड़ी होती है। जिनेंद्र भगवान की आराधना, अभिषेक, पूजन अथवा विधान कराने का अवसर जीवन का सौभाग्य मानना चाहिए।

लक्ष्मी का सदुपयोग आवश्यक

आचार्यश्री ने कहा कि लक्ष्मी का स्वभाव चंचल है। संपत्ति का संग्रह और प्रदर्शन करने के बजाय उसका सदुपयोग करना चाहिए। जरूरतमंदों की सहायता, शिक्षा में सहयोग, असहायों को भोजन, जीवदया तथा धार्मिक संस्कारों के संवर्धन जैसे कार्यों से धन का वास्तविक महत्व प्रकट होता है।

उन्होंने कहा कि धनवान होना ही सेवा की अनिवार्य शर्त नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार समय, श्रम, संसाधन और सद्भावना से धार्मिक व सामाजिक कार्यों में योगदान दे सकता है।

पूजा के साथ आचरण का निरीक्षण भी जरूरी

आचार्यश्री ने कहा कि धार्मिक विधान और अनुष्ठान केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं होते, बल्कि उनका उद्देश्य मनुष्य को धर्म के निकट लाना और सद्भावनाओं का विकास करना है। पूजा-अर्चना के साथ व्यक्ति को अपने आचरण का निरीक्षण भी करना चाहिए।

यदि व्यवहार में क्रोध, मान, माया, लोभ और अहंकार बना रहे, तो आत्मचिंतन आवश्यक है। धर्म का प्रभाव तभी दिखता है, जब जीवन में अहिंसा, संयम, विनय, करुणा और परस्पर सम्मान का विकास हो।

श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना