मुरैना। जैन दर्शन में सम्यक ज्ञान को आत्मकल्याण का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। आचार्यश्री 108 उदारसागरजी महाराज ने कहा कि अज्ञान के कारण मनुष्य नश्वर पदार्थों में सुख खोजते हुए मोह-ममता के बंधनों में उलझता है और दुखी होता है।
उन्होंने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाना नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझकर सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र के मार्ग पर आगे बढ़ना है।
शरीर नहीं, आत्मा की पहचान आवश्यक
आचार्यश्री ने शरीर और आत्मा के अंतर को समझाते हुए कहा कि शरीर चेतन आत्मा के संयोग से ही उपयोगी दिखाई देता है। शरीर पुद्गल अर्थात भौतिक पदार्थ है, जबकि आत्मा चेतन द्रव्य है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य प्रायः शरीर की सुंदरता, वस्त्रों, आभूषणों और बाहरी प्रतिष्ठा पर अधिक ध्यान देता है, किंतु आत्मा के गुणों को विकसित करने की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं देता। शरीर की आवश्यक देखभाल करते हुए राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों को कम करने का प्रयास करना चाहिए।
नकली हार के दृष्टांत से समझाया ज्ञान-अज्ञान का अंतर
आचार्यश्री ने एक दृष्टांत के माध्यम से ज्ञान और अज्ञान का अंतर समझाया। एक महिला पड़ोसी जैसा सोने का हार पाने की इच्छा रखती थी। पति उसकी जिद पर बाजार से सुंदर हार लाया, जिसे वह बहुमूल्य समझकर बहुत प्रसन्न हुई।
कुछ समय बाद हार चोरी हो गया तो वह अत्यंत दुखी हुई, लेकिन पति ने बताया कि हार असली सोने का नहीं, बल्कि नकली था। आचार्यश्री ने कहा कि घटना एक ही थी, किंतु वास्तविकता का ज्ञान होने से पति का दृष्टिकोण अलग था। इसी प्रकार वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप का बोध होने पर उनके प्रति मोह की तीव्रता कम होने लगती है।
ज्ञान को व्यवहार में उतारने की प्रेरणा
मुनि श्री 108 उपशांतसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर की धर्मसभा में कहा कि धन, संपत्ति, आभूषण, पद और प्रतिष्ठा उपयोगी हो सकते हैं, किंतु इन्हें आत्मा का स्वरूप या स्थायी सुख का आधार मानना उचित नहीं है।
उन्होंने धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन, संतवाणी के श्रवण, स्वाध्याय, ध्यान और आत्मनिरीक्षण को ज्ञान प्राप्ति के महत्वपूर्ण साधन बताया। मुनिश्री ने कहा कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह व्यवहार में दिखाई दे और राग-द्वेष को कम करने में सहायक बने।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





