कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर जी महाराज ने कहा कि जीवन स्वर्ग बनेगा या नर्क, यह परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारी समझ और दृष्टिकोण से तय होता है। संतोष का भाव हो तो अभावों में भी सुख का अनुभव किया जा सकता है, जबकि असंतोषी व्यक्ति वैभव और सुविधाओं के बीच भी अशांत रहता है।
उन्होंने कहा कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए विचारों और परिणामों को निर्मल बनाना आवश्यक है।
धर्म को जीवन में उतारें
मुनि श्री ने स्वाध्याय एवं गुरु-सान्निध्य का महत्व बताते हुए कहा कि शास्त्र जीवन को दिशा देते हैं, जबकि गुरु अपने अनुभव से उनमें वर्णित सिद्धांतों को सरल और व्यवहारोपयोगी बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि धर्म केवल पढ़ने-पढ़ाने या अच्छी बातें कहने का विषय नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारने की साधना है। पूजन, अभिषेक, दान और सेवा का वास्तविक आनंद तभी मिलता है, जब ये आचरण का हिस्सा बनते हैं।
जिनशासन में साधु और गृहस्थ दोनों की भूमिका
मुनि श्री ने कहा कि जिनशासन का रथ दो पहियों पर चलता है। एक ओर मुनि, आर्यिका, ऐलक और क्षुल्लक जैसे त्यागी साधक हैं, तो दूसरी ओर गृहस्थ श्रावक-श्राविकाएं। त्यागी परमार्थ के लिए अपना सर्वस्व त्यागते हैं, जबकि गृहस्थ अपनी सामर्थ्य के अनुसार धर्म और समाज के कार्यों में योगदान देते हैं।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में धन अर्जित करना अपने आप में परिग्रह नहीं है। मेहनत और ईमानदारी से अर्जित धन का उपयोग परिवार के दायित्वों, वृद्ध माता-पिता की सेवा, दान, पूजा, धर्मप्रभावना और समाजहित के कार्यों में किया जाए तो वही धन परमार्थ का माध्यम बन सकता है।
संग्रह और परिग्रह में अंतर
मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि धन का संग्रह और परिग्रह अलग-अलग बातें हैं। धन के प्रति तीव्र मोह, आसक्ति और उसका केवल विषय-भोगों में उपयोग करने की भावना परिग्रह का कारण बनती है।
इसके विपरीत, धन का विवेकपूर्ण उपयोग जनहित, समाजहित और राष्ट्रहित के कार्यों में किया जाए तो वह सेवा का साधन बन जाता है।
पिसनहारी की मढ़िया का दृष्टांत
जबलपुर स्थित पिसनहारी की मढ़िया का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि एक गरीब महिला ने अनाज पीसकर अर्जित धन में से बचत कर जिनप्रतिमा स्थापित करने और छोटी मढ़िया बनवाने का संकल्प लिया था।
उन्होंने कहा कि एक ओर रानी दुर्गावती का मदन महल वैभव का प्रतीक था, वहीं दूसरी ओर उस महिला की श्रद्धा और परिश्रम से बनी मढ़िया कालांतर में तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित हुई। इससे स्पष्ट होता है कि धन की महानता उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग और उसके पीछे निहित भावना में होती है।
बड़े बाबा के प्रति श्रद्धा का आह्वान
मुनि श्री ने कुण्डलपुर के बड़े बाबा के मंदिर को देश-विदेश के दिगंबर जैन समाज की श्रद्धा, सहयोग और समर्पण का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की साधना और प्रेरणा ने कुण्डलपुर को विशिष्ट पहचान प्रदान की है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म, गुरु और तीर्थ के प्रति श्रद्धा बनाए रखते हुए जीवन को सदाचार, सेवा और परमार्थ से जोड़ने का आह्वान किया। इस अवसर पर विभिन्न ग्रामों और नगरों से आए श्रद्धालुओं ने बड़े बाबा के दर्शन, अभिषेक और शांतिधारा में सहभागिता की।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई, कुण्डलपुर





