मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री 108 उदारसागर जी महाराज ने कहा कि संसार में रहते हुए प्रत्येक जीव को निरंतर धर्माराधना करते रहना चाहिए। धर्माराधना का सबसे मूलभूत तत्व सम्यग्दर्शन है।

उन्होंने कहा कि शील, दान, तप और पूजा जैसे धार्मिक कार्य सम्यक्त्वपूर्वक किए जाएं तो वे मोक्षमार्ग में कार्यकारी बनते हैं। इसलिए मनुष्य के जीवन का लक्ष्य केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न रहकर सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होना चाहिए।

आत्मा को मोक्षमार्ग की ओर मोड़ता है सम्यग्दर्शन

आचार्यश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन आत्मा की दिशा बदलने वाला महत्वपूर्ण तत्व है। उनके अनुसार सम्यग्दर्शन से शुद्ध जीव अनेक अशुभ पर्यायों एवं दुखद अवस्थाओं से बचते हुए मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होता है।

उन्होंने कहा कि आत्मा को संसार के दुखों से बाहर निकालने के लिए निरंतर पुरुषार्थ, आत्मचिंतन, संयम और सम्यग्दर्शन आवश्यक हैं।

आयु कर्म और राजा श्रेणिक का प्रसंग

आचार्यश्री ने आयु कर्म के संबंध में राजा श्रेणिक का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि जीव मुख्य रूप से बद्धायुष्क और अबद्धायुष्क दो प्रकार के होते हैं। राजा श्रेणिक द्वारा यशोधर मुनि के गले में सर्प डालने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कर्मबंधन की सूक्ष्मता समझाई।

उन्होंने कहा कि क्रोध, अहंकार और प्रमाद में किया गया कार्य आत्मा के लिए गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकता है, जबकि पश्चाताप और आत्मचिंतन से भावों में परिवर्तन की संभावना बनती है। आचार्यश्री ने बताया कि आयु कर्म त्रिभाग में बंधता है, इसलिए प्रत्येक क्षण सजग रहना आवश्यक है।

गणेश प्रसाद वर्णी के प्रसंग से भाव-शुद्धि का संदेश

आचार्यश्री ने गणेश प्रसाद वर्णी जी के चूलगिरी दर्शन से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बाहरी शुद्धता के साथ भावों की शुद्धता भी आवश्यक है। क्रोध और कषाय के क्षणों में मनुष्य जाने-अनजाने ऐसे कर्मों का बंध कर सकता है, जिनका फल आगे भोगना पड़ता है।

श्रद्धा के साथ पुरुषार्थ भी जरूरी

मुनि श्री 108 उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में सफलता और सकारात्मक परिवर्तन के लिए जिनेन्द्र भगवान तथा साधु-संतों के प्रति दृढ़ श्रद्धा आवश्यक है। श्रद्धा केवल मंदिर दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि वीतराग वाणी पर विश्वास रखकर उसे जीवन में उतारना सच्ची श्रद्धा है।

उन्होंने कहा कि श्रद्धा में शक्ति होती है, लेकिन उसके साथ पुरुषार्थ और धर्माचरण भी जरूरी है। साधु-संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास जगाती है और उसे धर्ममार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

धर्मसभा में संतों के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को सम्यग्दर्शन, आत्मचिंतन, धर्माचरण और आत्मकल्याण के लिए निरंतर पुरुषार्थ करने का संदेश दिया।

श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना