सीकर। राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज दंग की नसिया पारस भवन सीकर में विराजित हैं। जन्म मृत्यु के बीच में क्या आवश्यक अनिवार्य कार्य श्रावकों को करना चाहिए। इसकी विस्तृत विवेचना में आचार्य श्री ने बताया कि जन्म निश्चित होता है किंतु मृत्यु अनिश्चित होती है बिरले व्यक्ति होते हैं, जो प्रतिदिन भगवान के विनय पूर्वक दर्शन करते हैं, अभिषेक करते हैं ,पूजन करते हैं जिनवाणी का श्रवण गुरमुख से करते हैं, साधुओं को आहार देते हैं, साधुओं की सेवा करते हैं। सच्चा श्रावक वही है जो साधुओं के आहार के लिए अपने घर का दरवाजा खुला रखता है तथा भगवान के दरवाजे पर हमेशा जाता है। आप जन्मदिन मनाकर खुशी मनाते हैं किंतु यह भूल जाते हैं कि हर नया वर्ष आपकी आयु को कम कर रहा है। भगवान के मंदिर से परिणाम भाव निर्मल होते हैं। कमलाबाई ने अंतिम समय तक भगवान के दर्शन किए। आचार्य साधुओं के दर्शन किए ,आहार दान दिया। उन्होंने श्रवण बेलगोला में भी एक वर्ष चौका लगाया और पौन्नूरमले चातुर्मास में भी चौका लगाया। आहार दान से पुण्य का अर्जुन कर लंबी आयु प्राप्त की। जीवन में चारित्र मोहनीय कर्म के कारण संयम प्राप्त करने में बाधा होती है।

मृत्युंजयी अर्थात संयम धारण करना चाहिए

डॉ.राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्मसागर सभागृह में उपस्थित धर्मालंबियों को संबोधित ने बताया कि सभी को जैन , तीर्थंकर कुल की मर्यादा अनुसार अनिवार्य कर्तव्य दर्शन, अभिषेक,पूजन संत समागम,स्वाध्याय आहार दान करना चाहिए।हर समय मृत्यु के प्रति सजग और सावधान रहना चाहिए मृत्युंजयी अर्थात संयम धारण करना चाहिए। असाता कर्म के फल से रोग और शोक आते हैं णमोकार मंत्र , भक्तामर मंत्र सहित जैन स्तोत्र मंत्रों में बहुत शक्ति है। जिसे बड़े से बड़े रोग भी ठीक हो जाते हैं और हुए हैं। कमला देवी ने दो सीख दी है साधुओं के लिए दरवाजे खुले रखें और भगवान के दरवाजे दर्शन करने रोज जाए।