मुरैना। नगर में चातुर्मासरत परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर जी महाराज ने जैन दर्शन में देवों के स्वरूप, उनके भेद और आध्यात्मिक दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मिथ्यादृष्टि देव जीव को संसार मार्ग की ओर, जबकि सम्यग्दृष्टि देव वीतरागता के मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं।
उन्होंने कहा कि देव आराधना में केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति का भाव नहीं होना चाहिए। श्रद्धालु को यह विचार करना चाहिए कि उसकी भक्ति उसे आत्मकल्याण की दिशा में ले जा रही है अथवा विषय-भोगों के बंधन में और अधिक बांध रही है।
देवगति भी संसार का ही पड़ाव
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन में देवगति को संसार से बाहर नहीं माना गया है। देव भी जन्म-मरण के चक्र में बंधे होते हैं। उनके पास वैभव और सुख-सुविधाएं हो सकती हैं, किंतु कर्मों का क्षय तथा वीतराग अवस्था प्राप्त हुए बिना मोक्ष संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को देवगति की आकांक्षा से आगे बढ़कर मोक्षमार्ग को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। सांसारिक सुख क्षणिक हैं, जबकि आत्मा का शुद्ध स्वरूप शाश्वत है।
पूजा का भाव तय करता है दिशा
आचार्यश्री ने कहा कि यदि व्यक्ति पूजा के माध्यम से केवल धन, पद, प्रतिष्ठा या सांसारिक सुखों की कामना करता है, तो उसकी दृष्टि संसार में ही बनी रहती है। इसके विपरीत भगवान के वीतराग स्वरूप का चिंतन कर राग-द्वेष का क्षय, संयम जागरण और आत्मस्वरूप की पहचान की भावना रखना आराधना को आत्मकल्याणकारी बनाता है।
उन्होंने कहा कि भगवान के चरणों में झुकना तभी सार्थक है, जब व्यक्ति का अहंकार झुके, क्रोध कम हो तथा क्षमा, संयम और त्याग का भाव बढ़े।
दर्पण केवल प्रेरणा देता है
मुनिश्री 108 उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि मंदिर जाना, पूजा-अर्चना करना और देवों का स्मरण करना तभी प्रभावी है, जब उसके बाद जीवन में परिवर्तन दिखाई दे। क्रोध में कमी, व्यवहार में विनम्रता, लोभ-मोह का क्षय और करुणा में वृद्धि धर्म के प्रभाव के संकेत हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दर्पण के सामने खड़े होने से चेहरा साफ नहीं होता, बल्कि उसे साफ करने की प्रेरणा मिलती है। उसी प्रकार भगवान और देवों के दर्शन मात्र से आत्मा शुद्ध नहीं होती; उनके वीतराग स्वरूप को देखकर अपने भीतर की अशुद्धियों को दूर करने का पुरुषार्थ आवश्यक है।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





