इंदौर। दशलक्षण महापर्व के नवें दिन नेमिनगर जैन कॉलोनी में उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुई। इस पावन अवसर पर मुनि कुंजर ज्येष्ठाचार्य आदिसागर जी अंकलीकर परंपरा के चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज ने उत्तम आकिंचन्य धर्म के गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप पर प्रवचन प्रदान करते हुए श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन एवं आत्मजागरण की प्रेरणा दी। प्रवचन में गुरुदेव ने बताया कि आकिंचन्य का अर्थ केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग करना नहीं, बल्कि भीतर के परिग्रह और ‘यह मेरा है’ के भाव का त्याग करना है। मनुष्य वस्तुओं को छोड़ भी दे, लेकिन यदि मन में उनके प्रति ममत्व बना हुआ है तो वास्तविक आकिंचन्य प्रकट नहीं होता। आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में अनंत ज्ञान, दर्शन और आनंद से संपन्न है; इसलिए बाहरी वस्तुओं के सहारे सुख खोजने के स्थान पर अपने भीतर के स्वरूप को पहचानना ही आकिंचन्य धर्म की वास्तविक साधना है।

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जब ‘मेरा’ कम होता है,तब भीतर की स्वतंत्रता बढ़ती

गुरुदेव ने श्रद्धालुओं को समझाया कि “मेरा घर, मेरा धन, मेरा पद, मेरा सम्मान” जैसे भाव ही मनुष्य को परिग्रह के बंधन में बांधते हैं। जब ‘मेरा’ कम होता है, तब भीतर की स्वतंत्रता बढ़ती है। उत्तम आकिंचन्य हमें वस्तुओं से भागना नहीं, बल्कि उनके प्रति आसक्ति से मुक्त होना सिखाता है। कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण के साथ हुआ। इसके पश्चात श्रद्धालुओं द्वारा गुरुदेव को जिनवाणी भेंट की गई। दिन के समय श्रद्धालुओं ने स्वाध्याय के माध्यम से धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को समझा तथा आत्मचिंतन किया।

भक्तिमय वातावरण में लिया धर्म लाभ

संध्याकाल में गुरुदेव के मुखारविंद से शंका-समाधान का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं एवं धर्म संबंधी प्रश्नों का समाधान प्राप्त किया। इसके पश्चात गुरुदेव की मंगलमय आरती संपन्न हुई। पूरे परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहा और श्रद्धालुओं ने उत्तम आकिंचन्य धर्म की भावना को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।