मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान जैनाचार्य अभिनंदनसागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने दशलक्षण महापर्व के नौवें दिन धर्मसभा में उत्तम आकिंचन्य धर्म की व्याख्या की।
‘कुछ भी मेरा नहीं’ का भाव
आचार्यश्री ने कहा कि आकिंचन का अर्थ है—‘कुछ भी मेरा नहीं है’ इस भाव की अनुभूति। मनुष्य धन, मकान, दुकान, परिवार और अन्य साधनों को अपना स्थायी स्वत्व मानकर उनसे ममता और आसक्ति जोड़ लेता है। यही ममत्व आगे चलकर चिंता, भय और दुख का कारण बनता है।
उन्होंने कहा कि सच्चा आकिंचन धर्म केवल वस्तुओं को छोड़ना नहीं, बल्कि वस्तुओं के प्रति भीतर से ‘मेरा-मेरा’ का भाव छोड़ना है। गृहस्थ भी संसार में रहते हुए अपनी आसक्ति कम कर इस धर्म की साधना कर सकता है।
रेत की मुट्ठी का दृष्टांत
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य खाली हाथ संसार में आता है और खाली हाथ ही जाता है। जन्म के समय संपत्ति साथ नहीं आती और मृत्यु के समय धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा एवं वैभव साथ नहीं जाते। इसलिए संसार की वस्तुएं उपयोग के लिए हैं, संग्रह और ममत्व के लिए नहीं।
उन्होंने रेत की मुट्ठी का उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति जितना रेत को कसकर पकड़ता है, वह उतनी ही हाथ से निकलती जाती है। हाथ खोल देने पर रेत सहज रूप से टिक जाती है। इसी तरह वस्तुओं और संबंधों को कसकर पकड़ने से अशांति बढ़ती है, जबकि ममत्व ढीला करने से मन में शांति आती है।
‘मेरा’ से ‘मैं’ की यात्रा
मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि आकिंचन धर्म व्यक्ति को ‘मेरा’ से ‘मैं’ की यात्रा कराता है। परिग्रह बाहर की वस्तु नहीं, मन की पकड़ है और आकिंचन धर्म उस पकड़ को ढीला करने की साधना है।
उन्होंने कहा कि इच्छाएं पूरी होने पर समाप्त नहीं होतीं, बल्कि कई बार और बढ़ती जाती हैं। वास्तविक सुख वस्तुओं की संख्या बढ़ाने में नहीं, बल्कि इच्छाओं को सीमित करने और संतोष बढ़ाने में है। बाहरी संपत्ति नश्वर है, जबकि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र आत्मा की वास्तविक संपदा हैं।
आज उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा
दशलक्षण पर्व के अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की पूजा एवं आराधना की जाएगी। श्रद्धालुओं से मोह, ममता, लोभ, अहंकार और संग्रह-वृत्ति का त्याग कर आत्मशुद्धि की साधना करने का आह्वान किया गया।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





