धरियावद। भक्तामर विधान के 32वें दिन नौ पुण्यार्जक परिवारों ने विधान में बैठकर भक्तिभावपूर्वक संगीत एवं नृत्य के साथ आराधना की तथा मंडप पर अर्घ्य समर्पित किए। वातावरण भक्तिमय बना रहा। विधान के पश्चात आयोजित प्रवचन श्रृंखला में आचार्य कल्प पुण्य सागर जी महाराज ने कहा कि भाद्रपद मास में सोलह भावना पर्व चल रहा है। इसके अंतर्गत आज अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावना का दिन है। ज्ञान में निरंतर उपयोग लगाए रखना ही अभीक्ष्णज्ञानोपयोग है। साधक अपना एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गंवाता, बल्कि प्रत्येक क्षण ज्ञानार्जन में लगाता है। यही ज्ञान आगे चलकर मोक्षमार्ग को प्रशस्त करता है।

सम्यक ज्ञान सही निर्णय लेने की क्षमता देता है

आचार्यश्री ने कहा कि वर्तमान समय में व्यक्ति मोबाइल, टीवी और कंप्यूटर के माध्यम से स्वयं को ज्ञानवान समझने लगा है, लेकिन शास्त्रों का अध्ययन और बुजुर्गों के अनुभवों को सुनना कम हो गया है। इससे मस्तिष्क में मिथ्या ज्ञान तो भर जाता है, लेकिन सम्यक ज्ञान के अभाव में वह ज्ञान जीवनोपयोगी नहीं बन पाता। सम्यक ज्ञान व्यक्ति को सही निर्णय लेने की क्षमता देता है और स्वयं के साथ दूसरों के जीवन में भी सुख का मार्ग प्रशस्त करता है।

ज्ञानार्जन कर अपने जीवन को सार्थक बनाएं

उन्होंने कहा कि पुरुष चार प्रकार के होते हैं महापुरुष, दिव्य पुरुष, सत्पुरुष और सामान्य पुरुष। हम पुरुषत्व को प्राप्त कर चुके हैं, लेकिन वर्तमान में अधिकांश लोग सामान्य पुरुष बनकर रह गए हैं। जीवन में पुरुषार्थ, ज्ञानार्जन तथा धर्म, समाज और राष्ट्र के लिए विशेष कार्य करके व्यक्ति महापुरुष, सत्पुरुष अथवा दिव्य पुरुष बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। आचार्यश्री ने कहा कि जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है। हमें निरंतर ज्ञानार्जन करते हुए अपने जीवन को सार्थक और सफल बनाना चाहिए।