कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में सम्यक ज्ञान का जागरण अत्यंत आवश्यक है। यही ज्ञान व्यक्ति को अपने-पराए, सही-गलत और हित-अहित का बोध कराता है। धन, संपत्ति, परिवार, व्यापार और प्रतिष्ठा पुण्य के उदय से प्राप्त हो सकते हैं, किंतु आत्मा का यथार्थ ज्ञान और सम्यक दृष्टि प्राप्त करना दुर्लभ है।

आत्मपहचान का ज्ञान आवश्यक

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने प्रवचन में कहा कि बाहरी संसार का ज्ञान प्राप्त करने के साथ व्यक्ति को स्वयं की पहचान और जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर भी विचार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक और किसान सहित प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र का ज्ञान रखता है। विज्ञान ने भौतिक संसार और प्रकृति के अनेक रहस्यों को समझने में सहायता की है, लेकिन जैन दर्शन उस ज्ञान को अधिक महत्वपूर्ण मानता है, जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराए।

जानकारी नहीं, सही दृष्टि है सम्यक ज्ञान

मुनि श्री ने कहा कि सम्यक ज्ञान केवल जानकारी एकत्र करना नहीं, बल्कि उचित और अनुचित के बीच विवेकपूर्ण अंतर समझना है। दूध और शराब के उदाहरण से उन्होंने समझाया कि गुण-दोष का ज्ञान न होने पर व्यक्ति बिना विवेक के अनुचित को भी ग्रहण कर सकता है।

उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथों का अध्ययन, तीर्थंकरों की देशना का श्रवण और गुरुजनों का सान्निध्य सही दृष्टि प्रदान करता है। व्यक्ति तत्काल अपनी सभी कमियां न भी छोड़ पाए, पर सही-गलत का बोध होने पर सुधार की दिशा खुलती है।

प्रगति के साथ सावधानी जरूरी

जीवन में सावधानी का महत्व बताते हुए मुनि श्री ने सड़क पर लगे चेतावनी संकेतों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन चमक-दमक अथवा जल्दबाजी में विवेक नहीं खोना चाहिए।

नशे में वाहन चलाना, गलत ढंग से आगे निकलने का प्रयास और संकेतों की उपेक्षा दुर्घटनाओं का कारण बन सकती है। व्यक्ति की छोटी-सी लापरवाही उसके साथ अन्य लोगों के जीवन को भी संकट में डाल सकती है। इसलिए प्रगति के साथ संयम, विवेक और सावधानी आवश्यक है।

स्वयं करना होगा आत्मकल्याण का प्रयास

मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति को विचार करना चाहिए कि वह कौन है, कहां से आया है और जीवन की दिशा क्या है। जैन दर्शन का सार आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर अपने स्वभाव की ओर लौटना है।

उन्होंने कहा कि गुरु मार्ग और दिशा दिखाते हैं, लेकिन आत्मपरिवर्तन तथा आत्मकल्याण का प्रयास व्यक्ति को स्वयं करना होता है। दया, करुणा, अहिंसा और विवेक को अपनाकर संसार मार्ग और मोक्षमार्ग के अंतर को समझना ही जीवन की सार्थक दिशा है।

श्रीफल साथी : राजीव सिंघई, कुण्डलपुर