कुण्डलपुर (म.प्र.)। निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि दृष्टिबाधित होना जीवन की कमजोरी नहीं है। व्यक्ति को अपनी क्षमताओं को पहचानकर आत्मविश्वास, परिश्रम और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अपनी शारीरिक स्थिति को लेकर हीनभावना रखने के बजाय प्रतिभा और संकल्प के बल पर समाज एवं राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहिए।

दृष्टिबाधित जय जिनेंद्र मित्र मंडल भारत समूह के सदस्यों ने मुनि संघ के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर मुनिश्री ने सदस्यों को संतोष का सूत्र देते हुए कहा, “जो प्राप्त है, सो पर्याप्त है।” उन्होंने कहा कि संतोष, आत्मविश्वास और सकारात्मक विचार व्यक्ति को भीतर से सशक्त बनाते हैं।

लक्ष्य पहचानने से मिलती है सफलता

मुनिश्री ने कहा कि प्रकृति यदि एक क्षमता में कमी देती है, तो अन्य क्षमताओं के विकास का अवसर भी प्रदान करती है। आज दृष्टिबाधित अनेक लोग शिक्षा, प्रशासन, बैंकिंग, व्यवसाय एवं अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण दायित्व निभा रहे हैं। सफलता केवल आंखों से देखने पर नहीं, बल्कि लक्ष्य की पहचान और उसे पाने के दृढ़ संकल्प पर निर्भर करती है।

उन्होंने कहा कि संगठन का उद्देश्य देशभर के जैन दृष्टिबाधितजनों को एक मंच पर जोड़ना, उनकी समस्याओं के समाधान में सहयोग देना तथा दृष्टिबाधित बच्चों को शिक्षा एवं आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित करना है। इस उद्देश्य की जानकारी पाकर मुनिश्री ने प्रसन्नता व्यक्त की और सभी को अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखने का आशीर्वाद दिया।

धर्म व्यवहार में दिखाई दे

मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि सम्यक दर्शन को केवल पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं रखना चाहिए। सक्रिय सम्यक दर्शन का अर्थ है कि धर्म जीवन के व्यवहार में दिखाई दे। मंदिर की पूजा, सामायिक और विधान के साथ गौशाला, जीवदया, पाठशाला, जरूरतमंदों की सहायता और समाजसेवा से जुड़ना भी सम्यक दर्शन की सक्रिय अभिव्यक्ति है।

उन्होंने कहा कि अनाथ, वृद्ध, बीमार एवं असहाय प्राणियों की पीड़ा को समझकर उनके लिए आगे आना केवल सेवा नहीं, बल्कि आत्मा में करुणा के भावों को जागृत करने का माध्यम है।

निस्वार्थ सेवा की सुगंध

मुनिश्री ने कहा कि सहयोग में स्वार्थ और सौदेबाजी का भाव नहीं होना चाहिए। सहायता अखबार में नाम प्रकाशित कराने के लिए नहीं, बल्कि जरूरतमंद की आवश्यकता पूरी करने के लिए की जानी चाहिए। “नेकी कर दरिया में डाल” का भाव अपनाते हुए उपकार का प्रचार नहीं करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि वास्तविक सेवा की सुगंध फूल की तरह स्वयं फैलती है। सेवा करते समय पात्रता और वास्तविक आवश्यकता को समझना भी जरूरी है। जरूरतमंद व्यक्ति की परिस्थितियों को जानकर अपनी क्षमता के अनुरूप सहयोग करना ही धर्मसम्मत सेवा है।

बच्चों के जन्मदिन को बनाएं संस्कार दिवस

मुनिश्री ने परिवारों से बच्चों को सक्रिय सम्यक दर्शन से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बच्चों के जन्मदिन को केवल मौज-मस्ती और अनावश्यक खर्च का अवसर न बनाकर संस्कार दिवस बनाया जा सकता है। बच्चे को मंदिर दर्शन, अभिषेक, पाठशाला, गौशाला में जीवसेवा और जरूरतमंदों की सहायता से जोड़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब जन्मदिन सेवा और संस्कार से जुड़ता है, तो वह केवल उम्र बढ़ने का दिन नहीं रहता, बल्कि जीवन में अच्छे संकल्प लेने का अवसर बन जाता है।

भक्तामर महामंडल विधान संपन्न

प्रातःकालीन बेला में भक्तामर महामंडल विधान, बड़े बाबा भगवान आदिनाथ का अभिषेक, ऋद्धि कलश एवं शांतिधारा मुनि श्री के सान्निध्य में संपन्न हुई। शांतिधारा का वाचन मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज ने किया। ऐलक श्री निश्चयसागर जी महाराज ने मंत्रोच्चार के साथ अष्ट प्रातिहार्य में छत्र एवं चंवर समर्पित कराए। देशभर से आए श्रद्धालुओं ने बड़े बाबा के चरणाभिषेक का सौभाग्य प्राप्त किया।

सोशल मीडिया पोस्टर सार

दृष्टिबाधिता कमजोरी नहीं, आत्मविश्वास से आगे बढ़ने का संदेश।

मुनि श्री समतासागर जी ने बताया सक्रिय सम्यक दर्शन का अर्थ।

सेवा, करुणा और संस्कारों को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान।

श्रीफल साथी : राजीव सिंघई