कुण्डलपुर (म.प्र.)। तकनीक के साधन और स्वरूप बदलते रहेंगे, लेकिन अच्छे जीवन के लिए आवश्यक नैतिक शिक्षा एवं संस्कारों के सिद्धांत कभी नहीं बदलेंगे। निर्यापक श्रमण वात्सल्य मूर्ति मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने यह विचार कुण्डलपुर में आयोजित दो दिवसीय जैन पाठशाला अधिवेशन के समापन अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि अधिवेशन में मध्यप्रदेश की करीब 170 जैन पाठशालाओं के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।
बच्चों ने निकाली प्रभावना रैली
रविवार सुबह पाठशालाओं के बच्चों, शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं ने अपने-अपने नगर और तहसील के बैनर के साथ करीब एक किलोमीटर लंबी प्रभावना रैली निकाली। रैली में बच्चों का उत्साह और पाठशालाओं की तैयारी आकर्षण का केंद्र रही।
मुनि श्री समतासागर जी महाराज एवं मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज ससंघ ने रैली का नेतृत्व किया। समापन पर सभी पाठशालाओं के बच्चों और शिक्षकों को आशीर्वाद दिया गया।
पाठशाला समाज निर्माण की आधारशिला
मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि इतने कम समय में बड़े स्तर पर तैयारी और इतनी संख्या में पाठशालाओं का एकत्र होना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने ब्रह्मचारी भाइयों एवं कुण्डलपुर तीर्थक्षेत्र कमेटी के कार्यकर्ताओं को आशीर्वाद देते हुए कहा कि सामूहिक सहयोग से ज्ञान का यह यज्ञ आगे बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि गांव-गांव और नगर-नगर में चल रही पाठशालाएं समाज की महत्वपूर्ण उपलब्धि हैं। इनसे बच्चों को णमोकार मंत्र, धार्मिक ज्ञान और संस्कार मिलते हैं। पाठशाला की सफलता किसी एक व्यक्ति के प्रयास से संभव नहीं होती। इसमें अभिभावक, शिक्षक-शिक्षिकाएं, दानदाता और व्यवस्थापक समिति—सभी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
मुनिश्री ने प्रत्येक पाठशाला के विधिवत पंजीयन की आवश्यकता बताते हुए कहा कि इससे समय पर सूचना, आवश्यक सामग्री और सहयोग उपलब्ध हो सकेगा तथा समस्याओं पर व्यवस्थित रूप से विचार किया जा सकेगा।
मोबाइल और एआई के उपयोग में विवेक जरूरी
मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि गूगल के बाद एआई आया है और भविष्य में इससे भी नई तकनीकें आएंगी। तकनीक बदलती रहेगी, लेकिन नैतिक शिक्षा की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होगी। बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ यह समझना जरूरी है कि क्या सही है, क्या गलत है और साधनों का उपयोग किस दिशा में करना है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की बात करने से पहले माता-पिता को स्वयं मोबाइल के उपयोग में नियंत्रण रखना चाहिए। मोबाइल और एआई को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन इनके उपयोग में विवेक और सीमा आवश्यक है। अष्टमी-चतुर्दशी जैसे अवसरों पर भोजन के उपवास के साथ एक दिन मोबाइल से दूर रहने का संकल्प भी आत्म-अनुशासन का अभ्यास बन सकता है।
परिवार, पाठशाला और स्कूल—तीन संस्कार केंद्र
मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज ने कहा कि बच्चे के जीवन की पहली पाठशाला परिवार, दूसरी मंदिर की पाठशाला और तीसरी स्कूल का वातावरण है। इन तीनों के साथ संत-मुनियों का सान्निध्य मिल जाए तो बच्चे के जीवन को सर्वश्रेष्ठ दिशा मिलती है।
उन्होंने कहा कि बच्चे केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि अपने आसपास के वातावरण से भी सीखते हैं। परिवार के संस्कार, पाठशाला की नैतिक-धार्मिक शिक्षा और स्कूल का वातावरण मिलकर व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
प्रस्तुतियां और सम्मान
कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण, मुरादाबाद से आए राकेश सेठी एवं क्षेत्र पदाधिकारियों द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ। सभी पाठशालाओं ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। दोपहर बाद पाठशाला प्रबंधकों को सम्मानित किया गया।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई, कुण्डलपुर




