झुमरीतिलैया (कोडरमा)। जैन धर्म के पर्वाधिराज दशलक्षण पर्युषण के आठवें दिन जैन धर्मावलंबियों ने उत्तम त्याग धर्म की श्रद्धापूर्वक आराधना की। महासंत मुनि श्री 108 सुयशसागर महाराज एवं मुनि श्री 108 कौशलसागर महाराज के सान्निध्य में श्रद्धालुओं ने धर्मोपदेश एवं धार्मिक अनुष्ठानों का लाभ लिया।

त्याग से ही जीवन बनता है पूज्य

मुनि श्री ने कहा कि उत्तम त्याग धर्म दान और विवेकपूर्ण विसर्जन का दिन है। व्यक्ति जीवनभर धन, वैभव और बाहरी पदार्थों का अर्जन करता है, किंतु बुद्धि एवं विवेकपूर्वक उनका सदुपयोग और त्याग किए बिना जीवन का वास्तविक कल्याण संभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन त्याग पर आधारित है। जीवन में जो जितना त्याग करता है, वह उतनी ही ऊंचाइयों को प्राप्त करता है। महापुरुष और श्रेष्ठ व्यक्ति बनने के लिए त्याग आवश्यक है। आवश्यकता से अधिक संग्रहित वस्तुओं का उचित समय पर विसर्जन न हो तो जीवन में बंधन बढ़ता है।

देने की संस्कृति है जैन दर्शन

मुनि श्री ने कहा कि जैन धर्म प्रकृति का धर्म है, जहां त्याग और देने की संस्कृति का विशेष महत्व है। जैन दर्शन में केवल धनपति का नहीं, बल्कि त्यागी का सम्मान होता है। स्वस्थ और संतुलित जीवन के लिए त्याग धर्म को समझना एवं जीवन में उतारना आवश्यक है।

विश्व शांति धारा और अभिषेक

बड़ा मंदिर में मुनि सुयशसागर महाराज एवं मुनि कौशलसागर महाराज के मुखारविंद से विश्व शांति धारा का पाठ हुआ। देवाधिदेव भगवान पार्श्वनाथ की मूल वेदी में प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा का सौभाग्य वार्ड पार्षद पिंकी जैन, नवीन जैन, सम्यक जैन एवं प्रज्ञा जैन परिवार को मिला।

भगवान मुनिसुव्रतनाथ के प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा का सौभाग्य दस लक्षण व्रतधारियों को प्राप्त हुआ। पंडाल परिसर में भगवान महावीर स्वामी के प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा का सौभाग्य प्रकाश जैन गंगवाल परिवार तथा ऋषभ जैन काला परिवार को मिला। महाशांतिधारा सुरेश-संदीप जैन पहाड़िया परिवार ने की।

नया मंदिर में शांतिधारा का सौभाग्य प्रदीप, पीयूष एवं राहुल जैन छाबड़ा परिवार तथा ओमप्रकाश-विनीत जैन सेठी परिवार को प्राप्त हुआ। भगवान आदिनाथ की वेदी पर शांतिधारा पवन, एकांत एवं निशांत जैन परिवार ने की। समाज पदाधिकारियों ने सभी पुण्यार्जक परिवारों का लौंग की माला पहनाकर सम्मान एवं धर्मकार्य की अनुमोदना की।

श्रीफल साथी : राजकुमार जैन अजमेरा