मुरैना। आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए अमूढ़दृष्टि अंग की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने कहा कि मूढ़ता अर्थात अज्ञानता और विवेकहीनता से रहित दृष्टि को अमूढ़दृष्टि कहा जाता है। मनुष्य को सत्य और असत्य, उचित और अनुचित तथा धर्म और अधर्म में भेद करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। मिथ्या मार्ग तथा उस मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों की मन, वचन और काय से प्रशंसा न करना ही सम्यक् दृष्टि का लक्षण है। आचार्य श्री ने कहा कि जैन दर्शन केवल मान्यता के आधार पर किसी बात को स्वीकार करने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि तत्त्वज्ञान और विवेक के आधार पर सत्य को समझने की प्रेरणा देता है। हमें जिन समीचीन तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त हुआ है, उन्हीं के अनुरूप हमारा श्रद्धान होना चाहिए। यदि ज्ञान कुछ और कहता है और श्रद्धा किसी अन्य दिशा में चली जाती है, तो वहां सम्यक्दर्शन की पूर्णता नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य चमत्कारों से शीघ्र प्रभावित हो जाता है। किसी व्यक्ति के संबंध में कोई असाधारण बात सुनकर या किसी स्थान को चमत्कारी बताकर लोग वहां आस्था जोड़ लेते हैं, लेकिन जैन दर्शन हमें चमत्कार के पीछे नहीं, बल्कि चारित्र और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। जैन दर्शन चमत्कार की पूजा नहीं, बल्कि चारित्र की पूजा करना सिखाता है। जिसके जीवन में संयम, त्याग, अहिंसा, सत्य और आत्मशुद्धि के गुण हैं, वही वास्तव में सम्मान और अनुकरण का पात्र है।

स्वार्थ नहीं, परमार्थ की दृष्टि जरूरी

आचार्य श्री ने कहा कि स्वार्थी व्यक्ति अपने लाभ को ही सर्वाेपरि मानता है। उसे इस बात की चिंता कम रहती है कि उसका मार्ग उचित है अथवा अनुचित। इसके विपरीत विवेकशील व्यक्ति अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानता है और परमार्थ के मार्ग पर आगे बढ़ता है। हमें अपने जीवन में ऐसे साधनों और मान्यताओं को स्वीकार करना चाहिए, जो आत्मकल्याण की दिशा में ले जाएं। उन्होंने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु परमार्थ के वास्तविक आधार हैं। इनके द्वारा बताए गए मार्ग को समझकर जीवन में उतारना चाहिए। सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए मिथ्या मान्यताओं, अंधविश्वासों और कुप्रथाओं का सहारा लेना आत्मकल्याण का मार्ग नहीं हो सकता।

टांगी बाबा का उदाहरण देकर समझाई अंध श्रद्धा

अमूढ़दृष्टि के स्वरूप को सरलता से समझाने के लिए आचार्य श्री ने टांगी बाबा का रोचक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति घर से बाहर गया तो उसने रेस्ट हाउस के पास एक स्थान देखा, जिसे लोग टांगी बाबा का स्थान कहकर मानने लगे थे। वहां वास्तव में कोई बाबा नहीं था। कुछ समय पूर्व उसी स्थान पर एक कुत्ते की मृत्यु हो गई थी। एक व्यक्ति ने वहां फूल चढ़ाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे अन्य लोगों ने भी उसका अनुसरण करना शुरू कर दिया और कुछ समय बाद वह स्थान टांगी बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो गया। धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा कि जब कोई बात बार-बार कही जाती है और बहुत से लोग उसे मानने लगते हैं, तो वह लोगों को सत्य प्रतीत होने लगती है, जबकि वास्तविकता कुछ और हो सकती है। इसलिए धर्म के क्षेत्र में भी केवल लोक प्रचलित बातों को देखकर विश्वास नहीं करना चाहिए। प्रसिद्धि सत्य की कसौटी नहीं है। सत्य को तत्त्वज्ञान और विवेक की कसौटी पर परखना आवश्यक है।

धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि अंधश्रद्धा से बचने के लिए प्रत्येक धार्मिक मान्यता को तत्त्वज्ञान की दृष्टि से समझना चाहिए। किसी मिथ्या देवी-देवता या चमत्कारी स्थान से सांसारिक लाभ की अपेक्षा करना और उसके पीछे अपनी श्रद्धा लगा देना सम्यक् श्रद्धान नहीं है। मुनिश्री ने कहा कि अमूढ़ दृष्टि हमें यह सिखाती है कि हम किसी भी मिथ्या मान्यता, कुपथ या अंधविश्वास से प्रभावित न हों। धर्म को केवल परंपरा के रूप में न अपनाकर उसके वास्तविक स्वरूप को समझें। जहां विवेक है, वहीं सम्यक् श्रद्धान है और जहां सम्यक श्रद्धान है, वहीं आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

एकाग्रचित्त होकर श्रद्धालुओं ने सुने प्रवचन

धर्मसभा का सफल संचालन वनीत जैन शास्त्री ने किया। कार्यक्रम के प्रारंभ में सम्मानीय जनों द्वारा चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया। मंगलाचरण गुंजन जैन ने प्रस्तुत किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के प्रवचनों को एकाग्रचित्त होकर श्रवण किया।