इंदौर। दलालबाग स्थित विद्या सुधा देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा में मुनि सुधासागर महाराज ने कहा कि केवल धार्मिक क्रियाएं करना ही धर्म नहीं है, बल्कि उनके पीछे सच्चा भाव होना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि दान देने वाला हर व्यक्ति दानी, पूजा करने वाला हर व्यक्ति भक्त अथवा व्रत रखने वाला हर व्यक्ति सच्चा साधक हो—यह आवश्यक नहीं। पद और क्रिया से अधिक महत्वपूर्ण उसके पीछे का भाव और दायित्व है।
स्वार्थ नहीं, सेवा का भाव
मुनिश्री ने कहा कि हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारे संबंध वास्तव में सच्चे हैं या स्वार्थ पर आधारित। धर्म सिखाता है कि केवल यह न सोचें कि “यह मेरे किस काम आएगा?”, बल्कि विचार करें कि “मैं इसके किस काम आ सकता हूं?”
उन्होंने कहा कि पिता होना और पिता का दायित्व निभाना, गुरु को मानना और गुरु आज्ञा को जीवन में उतारना—ये अलग-अलग बातें हैं।
सूखे पौधे से समझाया भावों का अंतर
सूखे पौधे का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि एक व्यक्ति भविष्य में फल पाने की अपेक्षा से पौधे की सेवा करता है, जबकि दूसरा उसे बचाने और जीवन देने के भाव से पानी देता है। यही स्वार्थ और सेवा का अंतर है।
उन्होंने कहा कि जल, अग्नि और पृथ्वी निरंतर हमारी सेवा करते हैं, इसलिए मनुष्य को भी उनके प्रति जिम्मेदारी समझनी चाहिए। दृष्टि बदलते ही मिट्टी जैसी साधारण वस्तु भी मंदिर, कलश और भगवान के आसन का स्वरूप लेकर मंगलकारी बन जाती है।
हर संबंध को व्यापार न बनाएं
मुनिश्री ने कहा कि आज मनुष्य ने संबंधों को भी लेन-देन में बदल दिया है—“तुम मेरे काम आओ, मैं तुम्हारे काम आऊंगा।” यह प्रेम नहीं, व्यापार है।
उन्होंने श्रीराम के भाव का उल्लेख करते हुए कहा कि माता-पिता मेरे लिए नहीं, मैं माता-पिता के लिए हूं। यही भाव गुरु, माता-पिता, पति-पत्नी और समाज के सभी संबंधों में होना चाहिए। “तुम मेरे काम आओ या न आओ, मैं तुम्हारे काम आऊंगा”—यही प्रेम है।
मुनिश्री ने समाजजनों से आत्मपरीक्षण कर प्रत्येक संबंध में लेने के बजाय देने की भावना विकसित करने का आह्वान किया।
धर्मसभा में सहभागिता
धर्मसभा में सपना गोधा, मनीष गोधा, आनंद गोधा, नवीन गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, प्रिंसिपल टोंग्या, संजय पाटोदी, राहुल सेठी, डॉ. जैनेन्द्र जैन सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।
श्रीफल साथी : राजेश जैन दद्दू, इंदौर





