धामनोद। दिगंबर जैन समाज ने पर्वराज पर्युषण महापर्व के समापन पर क्षमावाणी पर्व श्रद्धा के साथ मनाया। समाजजनों ने गत वर्ष में जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा याचना की और मैत्रीभाव का संकल्प लिया।

क्षमा वीरों का आभूषण

जैन दर्शन में क्षमा को वीरों का आभूषण बताया गया है। ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ के भाव को आत्मसात करते हुए समाजजनों ने कहा कि क्षमा मांगने और क्षमा करने से मन में बैर नहीं रहता तथा संबंधों की गांठें खुलती हैं।

संदेश दिया गया कि जैन परंपरा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन सभी जीवों से क्षमा याचना का भाव रखना चाहिए।

मन की शुद्धि के बिना साधना अधूरी

बड़वानी में विराजित आचार्य सुनीलसागर महाराज की शिष्या आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी ने धर्मसभा में कहा कि क्षेत्र की पवित्रता तभी सार्थक है, जब व्यक्ति अपने भावों को भी शुद्ध बनाए।

उन्होंने कहा कि मन में एक-दूसरे के प्रति वात्सल्य, भाईचारा, क्षमा, समर्पण और दया का भाव होना चाहिए। यदि मन की मलिनता दूर नहीं होगी, तो पूजा और उपवास की साधना भी अपना वास्तविक फल नहीं दे पाएगी।

अभिषेक, शांतिधारा और मंगलभाव

समाजजनों ने भगवान का अभिषेक एवं पूजन किया। आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी के मुखारविंद से शांतिधारा संपन्न हुई। इसके बाद सभी ने परस्पर क्षमा याचना की।

रत्नत्रय एवं सोलहकारण जी की माला की बोली प्राप्त करने वाले परिवारों को समाजजन बधाई देने उनके निवास तक पहुंचे।

श्रीफल साथी : धामनोद