इंदौर। दलाल बाग मैदान में आयोजित विशाल अखिल भारतीय श्रावक संस्कार शिविर में राष्ट्रसंत मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर महाराज ने हजारों शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान को जानने के साथ जगत के स्वरूप को भी समझना आवश्यक है। सुख के साथ दुःख और फूल के साथ कांटों को जानने वाला ही जीवन में सावधान रह सकता है।
उन्होंने कहा कि संसार में जितने भी ज्ञेय विषय हैं, उनका निष्पक्ष ज्ञान होना चाहिए। व्यक्ति को अपने हितैषी के साथ विरोधी की प्रवृत्तियों को भी समझना चाहिए, ताकि वह सही निर्णय ले सके। सत्य को केवल सुनना नहीं, बल्कि प्रज्ञा से ग्रहण कर जीवन में उतारना चाहिए।
सोलह हजार दीपों से जगमग हुई महाआरती
श्रावक संस्कार शिविर में सोलह हजार दीपों से महाआरती की गई। दीपों की आभा से पूरा शिविर परिसर जगमगा उठा और वातावरण भक्तिमय हो गया।
प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया ने कहा कि श्रावक संस्कार शिविर जीवन को बदलने का माध्यम है। शिविरार्थियों को प्रत्येक क्षण सजग रहना चाहिए, क्योंकि यहां मिलने वाला कोई भी संदेश जीवन के कल्याण की दिशा दे सकता है। उन्होंने बाल ब्रह्मचारी संघ के त्याग और तपस्या को जीवन का आदर्श बनाने की प्रेरणा दी।
सैनिकों के प्रति सम्मान और राष्ट्रधर्म
दोपहर के विशेष सत्र को राष्ट्रधर्म की शिक्षा के लिए समर्पित किया गया। मुनिश्री ने सीमा पर चौबीसों घंटे राष्ट्र की रक्षा करने वाले सैनिकों के योगदान को स्मरण करते हुए उनके प्रति सम्मान का भाव रखने की प्रेरणा दी।
मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में योगदान केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। घर, फैक्टरी, सरकारी कार्यालय अथवा किसी भी कार्यस्थल से व्यक्ति अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन कर राष्ट्र उत्थान में सहभागिता कर सकता है।
कर्म की स्थिति को जानना जरूरी
मुनिश्री ने राणा प्रताप के जीवन से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जीवन में सामने आने वाली चुनौतियों और विरोधी स्थितियों को समझना जरूरी है। जिस प्रकार राजा को शत्रु की गतिविधियों की जानकारी होना चाहिए, उसी प्रकार व्यक्ति को कर्मों की स्थिति और अपने भीतर की कमजोरियों को जानना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सब कुछ पढ़ना चाहिए, लेकिन सब कुछ करना आवश्यक नहीं है। हेय और उपकारी का विवेक करना जरूरी है। बुरे को जानना सत्य धर्म है, किंतु बुरा नहीं सोचना संयम धर्म है। सत्य के साथ संयम को धारण करने पर ही जीवन में सही निर्णय संभव हैं।
गांधीजी की सीख आज भी उपयोगी
मुनिश्री ने कहा कि संयम को स्वतंत्रता का नाम नहीं दिया जा सकता। आंखों को बंद करना नहीं, बल्कि हेय को देखकर भी उससे बचना संयम है। “बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो और बुरा मत सुनो” का संदेश आज भी उतना ही उपयोगी है।
उन्होंने संगति के महत्व पर कहा कि जिससे नुकसान होता हो उसका साथ छोड़ देना चाहिए तथा जिसके साथ रहने से उपकार हो, उसे अपनाना चाहिए। संयम के मार्ग को भय अथवा दुःख से नहीं, बल्कि विवेक और आत्मकल्याण की भावना से चुनना चाहिए।
बच्चों पर इच्छाओं का बोझ न डालें
मुनिश्री ने कहा कि बच्चों से इतनी अधिक अपेक्षाएं न करें कि वे उन्हें पूरा न कर पाने पर मानसिक दबाव में आ जाएं। माता-पिता का स्नेह बच्चों के लिए सहारा बने, दबाव नहीं। उन्होंने कहा कि कर्मभूमि में जन्म, दशलक्षण पर्व की आराधना, शिविरार्थी बनने तथा संयम ग्रहण करने का अवसर अत्यंत दुर्लभ और सौभाग्यपूर्ण है।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई, इंदौर




