मुरैना। नगर के श्री दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चातुर्मासरत आचार्य श्री उदारसागर जी महाराज ने नित्य की तरह धर्मसभा में उपगूहन अंग की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुणग्राही बनना कठिन है, जबकि दूसरों के दोष ढूँढ़ना अत्यंत सरल है। मनुष्य को दूसरों की कमियां देखने के बजाय उनके गुणों को ग्रहण करने का भाव रखना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि कुछ लोगों की आदत ही दूसरों की गलतियां ढूंढ़ने की होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक व्यक्ति जब भी किसी दूसरे की गलती देखता, उसके प्रतीक रूप में अपने घर के दरवाजे पर एक पत्थर रख देता था। प्रतिदिन ऐसा करते-करते उसके घर के सामने पत्थरों का ढेर लग गया और आने-जाने का रास्ता ही बंद हो गया। इसी प्रकार हम भी दूसरों के दोषों को अपने मन में एकत्र करते रहते हैं और अंततः हमारा अपना जीवन ही अशांत एवं संकुचित हो जाता है।
दोष सुधारने की भावना जरूरी
आचार्य श्री ने चित्रकार का उदाहरण देते हुए कहा कि एक चित्रकार ने सुंदर चित्र बनाया और उसके नीचे लिख दिया कि जिसे इसमें कोई गलती दिखाई दे, वह उसे सुधार दे। लोगों ने अपनी-अपनी दृष्टि से चित्र में अनेक सुधार कर दिए। शाम तक चित्र की स्थिति ऐसी हो गई कि उसे पहचानना भी मुश्किल हो गया। उन्होंने कहा कि दूसरों में दोष ढूंढ़ने के बजाय अपने भीतर सुधार करने की भावना रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी धर्मात्मा या साधर्मी से कोई भूल हो जाए तो उसकी सम्यग्दृष्टि एवं धर्मभावना को सुरक्षित रखते हुए उसके दोष को छिपाना और उसे सही मार्ग दिखाना ही उपगूहन अंग की भावना है। किसी की निंदा करना धर्म का मार्ग नहीं है। निंदा से नीच गोत्र कर्म का बंध होता है, इसलिए मनुष्य को निंदा से बचते हुए गुणग्राही बनने का प्रयास करना चाहिए।
श्रीपाल चरित्र से समझाया कर्मों का प्रभाव
आचार्य श्री ने श्रीपाल चरित्र के माध्यम से कर्म सिद्धांत की गहराई को समझाया। उन्होंने कहा कि श्रीपाल अत्यंत सुंदर थे। अल्प अवस्था में ही उन्हें राज्य प्राप्त हुआ तथा व्रतों को अंगीकार करने का अवसर भी मिला लेकिन, इसके बावजूद उनके जीवन में अनेक विपरीत परिस्थितियां आईं। उन्हें समुद्र में गिराए जाने और फांसी जैसी कठिन परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ा। उन्होंने श्रीपाल की पूर्व पर्याय का प्रसंग बताते हुए कहा कि पूर्व भव में राजा श्रीकंठ जंगल की एक गुफा में गए थे, जहां उन्होंने एक दिगंबर मुनिराज को अपमानजनक शब्द कहे थे। उस दोषपूर्ण भाव और कर्म के परिणामस्वरूप आगे चलकर श्रीपाल को अनेक विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
दोषदृष्टि रखने के बजाय गुणों को देखें
आचार्य श्री ने कहा कि कर्म का सिद्धांत अत्यंत सूक्ष्म और अटल है। इसलिए किसी व्यक्ति, साधु या साधर्मी के प्रति निंदा, उपहास अथवा दोषदृष्टि रखने के बजाय उसके गुणों को देखना चाहिए। श्रीपाल का जीवन हमें संदेश देता है कि कर्मों के परिणाम से कोई बच नहीं सकता और वर्तमान में किए गए भाव ही भविष्य का निर्माण करते हैं।
’गुणों को देखें, दोषों को नहीं’
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि दूसरों के दोषों को इकट्ठा करने के बजाय उनके गुणों को अपने जीवन में उतारना चाहिए। किसी साधर्मी से भूल हो जाए तो उसकी निंदा करने के बजाय प्रेमपूर्वक समझाकर उसे धर्ममार्ग पर आगे बढ़ाना चाहिए। यही उपगूहन अंग की वास्तविक सार्थकता है। उन्होंने कहा कि दोष देखना सरल है, लेकिन गुण देखना साधना है। जो व्यक्ति दूसरों के गुणों को ग्रहण करता है, वही वास्तविक अर्थों में गुणग्राही बनता है और अपने जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में आगे ले जाता है।
साधर्मी के प्रति वात्सल्य भाव रखने का संकल्प लिया
धर्मसभा का संचालन नवनीत जैन शास्त्री, मुरैना ने किया। मंगलाचरण गुंजन जैन ने प्रस्तुत किया। इसके बाद सम्मानीयजनों द्वारा चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के मंगलकारी एवं प्रेरणादायी उद्बोधन को श्रद्धापूर्वक सुना। श्रद्धालुओं ने उपगूहन अंग की भावना को आत्मसात करते हुए दोषदृष्टि छोड़कर गुणग्राही बनने तथा साधर्मी के प्रति वात्सल्य भाव रखने का संकल्प लिया।




