दमोह (कुंडलपुर)। मनुष्य संसार की नजरों से भले ही अपने कर्मों को छिपा ले, लेकिन धर्म की दृष्टि से प्रत्येक कर्म का लेखा-जोखा सुरक्षित रहता है। यह उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने प्रातः कालीन प्रवचन श्रृंखला सभा में व्यक्त किए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हमने सुना है,उधर विदेशों में यातायात नियमों का कोई उल्लंघन करता है तो आधुनिक तकनीक के माध्यम से स्वतःउसका जुर्माना हो जाता है, फिर वह जुर्माना उसको भरना ही भरना पडता है। उसी प्रकार धर्म के क्षेत्र में भी प्रत्येक शुभ और अशुभ कर्म जीवन की ष्धर्म-डायरी में स्वतः अंकित हो जाता है। इसलिए व्यक्ति को केवल दंड के भय से नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और धर्मबोध से नियमों का पालन करना चाहिए।

दान का महत्व उसकी राशि में नहीं,

मुनिश्री ने कहा कि हमारे देश में नियमों की कमी नहीं है,आवश्यकता उनके निष्पक्ष और कठोर पालन की है। यदि कानून का समान रूप से पालन कराया जाए तो समाज में अनुशासन स्वतः स्थापित हो जाएगा। इसी प्रकार धार्मिक जीवन में भी प्रत्येक व्यक्ति को यह स्मरण रखना चाहिए कि कर्मों का फल निश्चित है, इसलिए जीवन का प्रत्येक कार्य सजगता और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की महानता उसके धन, संपत्ति और वैभव से नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग से निर्धारित होती है। धनाढ्य, मध्यमवर्गीय अथवा सामान्य परिवार-सभी समान हैं। श्रेष्ठ वह है जो अपनी आय का कुछ भाग जनहित, परहित और धर्मकार्य में समर्पित करता है। दान का महत्व उसकी राशि में नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित सेवा और करुणा की भावना में होता है।

एक ही गुरु के अनुयायी हैं

प्रवचन में एक प्रेरक प्रसंग का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि एक संपन्न व्यक्ति ने समाज के सबसे कमजोर परिवार को सार्वजनिक रूप से सम्मान देकर यह संदेश दिया कि आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। हम सभी एक ही भगवान के उपासक और एक ही गुरु के अनुयायी हैं, इसलिए समाज का प्रत्येक व्यक्ति हमारा समान बंधु है। यही समतामयी और उदार दृष्टि सम्यक दर्शन का वास्तविक परिणाम है। मुनिश्री ने कहा कि सम्यक दर्शन का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देता है। किसी में गुण और विशेषता दिखाई दे तो उसके प्रति प्रमोदभाव रखें।

मध्यस्थ भाव रखना ही श्रेयस्कर

दीन-दुखी, रोगी, असहाय और दिव्यांगों को देखकर मन में करुणा जागृत हो तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सहायता करनी चाहिए। वहीं यदि दुष्ट या दुर्जन व्यक्ति से सामना हो जाए तो अनावश्यक विवाद से बचते हुए मध्यस्थ भाव रखना ही श्रेयस्कर है। न उसकी अनुचित प्रशंसा करें और न ही व्यर्थ के संघर्ष में पड़ें; जहाँ टकराव से कोई लाभ न हो, वहाँ शांतिपूर्वक स्वयं को अलग कर लेना ही विवेकपूर्ण आचरण है। उन्होंने कहा कि समता, करुणा, प्रमोद और माध्यस्थकृये चार भाव व्यक्ति के जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं।

आत्मकल्याण का माध्यम बनता है

जब मनुष्य नियमों के पालन, परोपकार, समानता और आत्मसंयम को अपने जीवन का आधार बना लेता है, तभी उसका जीवन समाज के लिए प्रेरणा और आत्मकल्याण का माध्यम बनता है। अविनाश जैन विद्यावाणी एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन जलज ने यह जानकारी दी।