धरियावद। भक्तामर महामंडल विधान के बारहवें दिन पांच जोड़ों ने सपरिवार भक्तामर विधान की विधि-विधानपूर्वक आराधना की। भक्तिमय एवं संगीतमय वातावरण में श्रद्धालुओं ने मंडप पर 48 स्वर्ण अर्घ समर्पित कर धर्मलाभ अर्जित किया।
संसार रूपी लता-बेल क्या है?
विधान के पश्चात आयोजित प्रवचन श्रृंखला में परम पूज्य आचार्य श्री पुण्यसागर जी महाराज ने “संसार रूपी लता-बेल क्या है?” विषय पर प्रेरणादायी प्रवचन दिया।
आचार्य श्री ने कहा कि जिस प्रकार कोई बेल किसी वृक्ष का सहारा लेकर उस पर चढ़ती है और धीरे-धीरे उसे सुखा देती है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन पर भी एक ऐसी बेल चढ़ी हुई है, जो उसे विनाश की ओर ले जाती है। यह बेल तृष्णा है।
तृष्णा कभी तृप्त नहीं होती
आचार्य श्री ने कहा कि तृष्णा रूपी बेल मनुष्य को संसार में भटकाती रहती है। आज मनुष्य के जीवन में धन, पद, प्रतिष्ठा, भोग-विलास और इच्छाओं की अनगिनत तृष्णाएं बनी हुई हैं।
मनुष्य जितना प्राप्त करता जाता है, उसकी इच्छाएं उतनी ही बढ़ती जाती हैं। तृष्णा की प्रकृति ही ऐसी है कि वह कभी तृप्त नहीं होती। अधिक पाने की लालसा मनुष्य को निरंतर अशांति और संसार के बंधनों की ओर ले जाती है।
आवश्यकताओं और इच्छाओं में करें अंतर
आचार्य श्री ने कहा कि तृष्णा को बढ़ाने वाला व्यक्ति संसार के बंधन को मजबूत करता है, जबकि तृष्णा को कम करने वाला व्यक्ति आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है।
मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं में अंतर समझना चाहिए। अनावश्यक इच्छाओं को नियंत्रित कर संयम, संतोष और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
अधिक पाना नहीं, लालसा कम करना ही उद्धार
आचार्य श्री ने संदेश देते हुए कहा कि जीवन का वास्तविक उद्धार अधिक से अधिक पाने में नहीं, बल्कि अधिक पाने की लालसा को कम करने में है। जब मनुष्य अपनी तृष्णा को कम करता है, तभी उसके भीतर संतोष, शांति और आत्मिक आनंद का उदय होता है।
धर्म का उद्देश्य बाहरी संग्रह बढ़ाना नहीं, बल्कि भीतर की अशांति और अनावश्यक इच्छाओं को कम करना है। संयम और संतोष के माध्यम से ही मनुष्य आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
भक्तिमय वातावरण में हुआ विधान
भक्तामर महामंडल विधान के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक आराधना की और स्वर्ण अर्घ समर्पित किए। विधान एवं प्रवचन के दौरान धर्म, भक्ति और आत्मचिंतन का वातावरण बना रहा।



