वह चाहता है कोई उसे रोक ले।

कोई उसके पास बैठ जाए।

कोई उसकी आंखों में झांककर पूछे—

“क्या हुआ है तुम्हें?”

लेकिन कई बार हम उसकी खामोशी को उसका स्वभाव समझ लेते हैं।

वह मुस्कुराता है तो हम मान लेते हैं कि वह खुश है।

वह कहता है “सब ठीक है” तो हम मान लेते हैं कि सचमुच सब ठीक है।

वह अकेला रहने लगता है तो हम कहते हैं—“आजकल लोगों को अपनी-अपनी जिंदगी से फुर्सत कहां है।”

और एक दिन…

बहुत देर हो जाती है।

10 सितंबर—विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस—हमारे सामने केवल आत्महत्या का आंकड़ा नहीं रखता, बल्कि एक बहुत बड़ा सामाजिक प्रश्न रखता है—

क्या हम अपने आसपास के इंसानों को सचमुच देख पा रहे हैं?

हम उनके चेहरे देखते हैं, कपड़े देखते हैं, काम देखते हैं, सफलता देखते हैं, लेकिन क्या हम उनका मन देख पाते हैं?

आदमी भीड़ में अकेला क्यों है?

यह समय अजीब है।

हमारे हाथ में दुनिया से बात करने वाला मोबाइल है, लेकिन अपने मन की बात कहने वाला कोई अपना नहीं।

सोशल मीडिया पर हजारों मित्र हैं, लेकिन रात के दो बजे रोते हुए फोन करने के लिए शायद एक भी व्यक्ति नहीं।

हमारे घर बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन उनमें संवाद के कमरे छोटे होते जा रहे हैं।

एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग कभी-कभी एक-दूसरे से ज्यादा अपने मोबाइल से जुड़े होते हैं।

बच्चा कमरे में चुप बैठा है।

मां समझती है—पढ़ रहा होगा।

पिता समझते हैं—मोबाइल चला रहा होगा।

भाई-बहन समझते हैं—आजकल ऐसा ही रहता है।

लेकिन उस कमरे के भीतर कोई ऐसा युद्ध चल रहा हो सकता है, जिसकी खबर बाहर बैठे किसी व्यक्ति को नहीं।

इसलिए आज जरूरत है कि हम अपने घरों में फिर से बातचीत लौटाएं।

बच्चों से केवल यह न पूछें—

“कितने नंबर आए?”

कभी पूछें—

“तुम खुश हो?”

युवाओं से केवल यह न पूछें—

“नौकरी कब लगेगी?”

कभी पूछें—

“तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?”

जीवनसाथी से केवल यह न पूछें—

“घर का काम हुआ?”

कभी पूछें—

“तुम थकी तो नहीं हो?”

और अपने माता-पिता से केवल दवा और खाने के बारे में न पूछें।

कभी उनके पास बैठकर पूछिए—

“आपको कुछ कहना है?”

हो सकता है किसी के पास बहुत कुछ हो, लेकिन कहने वाला कोई न हो।

एक परीक्षा जिंदगी का फैसला नहीं

हमने बच्चों के सामने सफलता की ऐसी तस्वीर खड़ी कर दी है, जिसमें केवल जीत है।

पहला आना है।

अच्छे अंक लाने हैं।

बड़ी नौकरी करनी है।

बड़ा घर बनाना है।

दूसरों से आगे निकलना है।

लेकिन जिंदगी ने कभी नहीं कहा कि हर दौड़ में पहला ही आना है।

कभी-कभी पीछे रह जाना भी जिंदगी का हिस्सा है।

कभी परीक्षा में कम अंक आते हैं।

कभी नौकरी नहीं मिलती।

कभी व्यापार डूब जाता है।

कभी प्रेम बिछड़ जाता है।

कभी दोस्त धोखा दे जाता है।

कभी परिवार साथ नहीं देता।

कभी आदमी खुद से ही हार जाता है।

लेकिन इनमें से कोई भी बात जिंदगी के अंत का कारण नहीं हो सकती।

क्योंकि एक परीक्षा का परिणाम आपकी पूरी जिंदगी नहीं है।

एक नौकरी आपकी पूरी पहचान नहीं है।

एक असफलता आपका पूरा भविष्य नहीं है।

और एक टूटता रिश्ता यह तय नहीं करता कि आने वाले वर्षों में आपको प्यार, सम्मान और खुशी नहीं मिलेगी।

आज का दर्द स्थायी नहीं होता।

समय बदलता है।

लोग बदलते हैं।

परिस्थितियां बदलती हैं।

और कई बार जिस समस्या को हम आज पहाड़ समझ रहे होते हैं, वही कुछ वर्षों बाद पीछे मुड़कर देखने पर एक छोटी-सी पहाड़ी लगती है।

बस हमें उस दिन तक पहुंचना होता है।

किसी के दुख को छोटा मत समझिए

हम अक्सर दुखी व्यक्ति से कहते हैं—

“इतनी-सी बात है।”

“तुम ज्यादा सोचते हो।”

“दुनिया में इससे बड़े दुख हैं।”

“मजबूत बनो।”

“समय सब ठीक कर देगा।”

हो सकता है हमारी नीयत अच्छी हो।

लेकिन दुख की घड़ी में ये शब्द कभी-कभी व्यक्ति को और अकेला कर देते हैं।

क्योंकि वह सोचता है—

“शायद कोई मेरी बात समझ ही नहीं सकता।”

इसलिए जब कोई दुखी हो तो उसके दुख का मुकाबला किसी और के दुख से मत कीजिए।

उसकी पीड़ा को छोटा मत कीजिए।

बस सुनिए।

बिना टोके।

बिना फैसला सुनाए।

बिना उपदेश दिए।

कभी-कभी किसी व्यक्ति को समाधान से पहले सहारा चाहिए।

उसे कोई ऐसा चाहिए जो कह सके—

“तुम्हारी बात मेरे लिए महत्वपूर्ण है।”

“तुम्हारा दर्द मुझे दिखाई दे रहा है।”

“तुम अकेले नहीं हो।”

मुस्कुराने वालों को भी देखिए

हमारे बीच ऐसे लोग भी हैं जो सबसे ज्यादा हंसते हैं।

सबको हंसाते हैं।

हर कार्यक्रम में सबसे आगे दिखाई देते हैं।

हर किसी का हाल पूछते हैं।

लेकिन जब रात होती है तो अपने कमरे में अकेले बैठकर रोते हैं।

हम उनकी हंसी देखकर धोखा खा जाते हैं।

हमें लगता है—

“यह आदमी तो बहुत खुश है।”

लेकिन हर मुस्कान खुशी का प्रमाण नहीं होती।

कभी-कभी मुस्कान भी एक पर्दा होती है।

इसलिए अपने आसपास के लोगों को थोड़ा ध्यान से देखिए।

किसी की दिनचर्या अचानक बदल गई है?

कोई लगातार खुद को अलग कर रहा है?

कोई बार-बार निराशा की बातें कर रहा है?

कोई अपने भविष्य के बारे में बिल्कुल उम्मीद नहीं दिखा रहा?

तो उसे अकेला मत छोड़िए।

उससे बात कीजिए।

जरूरत हो तो परिवार, विश्वसनीय मित्र, चिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेने के लिए उसके साथ रहिए।

और यदि किसी व्यक्ति को तत्काल स्वयं को नुकसान पहुंचाने का खतरा लगे, तो उसे अकेला न छोड़ें और तुरंत स्थानीय आपातकालीन/मानसिक स्वास्थ्य सहायता लें।

मदद मांगना कमजोरी नहीं।

मदद मांगना जिंदगी के पक्ष में लिया गया साहसिक निर्णय है।

हमारे संस्कार हमें क्या सिखाते हैं?

हमने दीपक जलाए हैं।

क्यों?

क्योंकि हम जानते हैं कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, एक छोटी-सी लौ उसका विरोध कर सकती है।

हमने प्रार्थना की है।

क्यों?

क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य को उम्मीद की जरूरत होती है।

हमने किसी भूखे को भोजन दिया है।

किसी प्यासे को पानी दिया है।

किसी गिरते हुए को उठाया है।

किसी रोते हुए को गले लगाया है।

तो फिर किसी टूटते हुए मनुष्य को थामना भी हमारी संस्कृति का हिस्सा क्यों न बने?

मंदिर में दिया जलाने से पहले अगर हम किसी उदास चेहरे पर मुस्कान जला दें, तो शायद वह भी पूजा होगी।

किसी भूखे को रोटी देने के साथ अगर किसी निराश व्यक्ति को उम्मीद दे दें, तो शायद वह भी सेवा होगी।

किसी को जीवन की ओर वापस ले आना—इससे बड़ी मानवता और क्या होगी?

माता-पिता से एक विनम्र आग्रह

अपने बच्चों को इतना प्यार दीजिए कि वे असफल होकर भी आपके पास लौट सकें।

उन्हें यह डर मत दीजिए कि—

“अगर तुम असफल हुए तो हमारा सिर झुक जाएगा।”

उन्हें यह भरोसा दीजिए—

“तुम जीतोगे तो भी हमारे हो, हारोगे तो भी हमारे हो।”

यह एक वाक्य किसी बच्चे की पूरी दुनिया बदल सकता है।

उसे बताइए कि अंक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बच्चा उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

करियर महत्वपूर्ण है, लेकिन जिंदगी उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सम्मान महत्वपूर्ण है, लेकिन इंसान उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

और युवाओं से…

अगर आज आपको लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है, तो कृपया एक पल रुकिए।

आज फैसला मत कीजिए।

किसी अपने को फोन कीजिए।

किसी के पास जाइए।

अपना दर्द बोलिए।

रोइए।

लेकिन अपने जीवन का दरवाजा हमेशा के लिए बंद मत कीजिए।

क्योंकि आपको अभी पता नहीं कि आने वाला कल आपके लिए क्या लेकर बैठा है।

जिस सुबह का सूरज आपने आज नहीं देखा, हो सकता है वही आपकी जिंदगी का सबसे सुंदर सूर्योदय हो।

जिस व्यक्ति से आप आज नहीं मिले, हो सकता है वह कल आपका सबसे अपना बन जाए।

जिस अवसर की आपको आज उम्मीद नहीं, हो सकता है वह कल आपके दरवाजे पर दस्तक दे।

जिंदगी के पास हमेशा दूसरा पन्ना होता है।

बस किताब बंद मत कीजिए।

आइए, एक छोटा-सा संकल्प लें

हम किसी की खामोशी को नजरअंदाज नहीं करेंगे।

किसी के दुख का मजाक नहीं बनाएंगे।

किसी की असफलता को उसकी पहचान नहीं बनाएंगे।

अपने बच्चों को तुलना की आग में नहीं झोंकेंगे।

अपने बुजुर्गों को अकेला नहीं छोड़ेंगे।

अपने मित्रों से केवल खुशी में नहीं, उनके कठिन समय में भी मिलेंगे।

और सबसे बढ़कर—

हम एक-दूसरे को यह विश्वास देंगे कि जिंदगी चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो जाए, बात करने के लिए कोई न कोई हमेशा मौजूद है।

क्योंकि कई बार किसी इंसान को बचाने के लिए डॉक्टर से पहले एक दोस्त चाहिए।

दवा से पहले संवाद चाहिए।

और समाधान से पहले किसी का हाथ चाहिए।

अंत में…

अगर आज आपके आसपास कोई ऐसा व्यक्ति है जो बहुत चुप है—

उसके पास जाइए।

उसके कंधे पर हाथ रखिए।

और उससे मत पूछिए—

“तुम इतने परेशान क्यों हो?”

बस इतना कहिए—

“मैं तुम्हारे साथ हूं।”

अगर वह रोए तो रोने दीजिए।

अगर वह बोलना चाहे तो सुनिए।

अगर वह चुप रहना चाहे तो उसके पास चुपचाप बैठिए।

क्योंकि हर दर्द का इलाज शब्द नहीं होते।

कभी-कभी साथ ही सबसे बड़ी दवा होता है।

और यदि आप स्वयं किसी गहरे अंधेरे से गुजर रहे हैं, तो याद रखिए—

आप बोझ नहीं हैं।

आपकी जिंदगी बेकार नहीं है।

आपकी कहानी खत्म नहीं हुई है।

थोड़ा ठहरिए।

किसी से बात कीजिए।

मदद लीजिए।

और सुबह का इंतजार कीजिए।

क्योंकि रात का काम अंधेरा करना है…

सुबह का काम लौटकर आना है।

इसलिए—

किसी को जाने मत देना।

किसी की आवाज खोने मत देना।

किसी की उम्मीद बुझने मत देना।

किसी को यह महसूस होने मत देना कि इस दुनिया में उसका कोई नहीं।

किसी का हाथ पकड़कर बस इतना कह देना—

“चलो…

अभी बहुत दूर जाना है।

यह जिंदगी है,

और जिंदगी अभी बाकी है।”