मुरैना। नगर के अम्बाह रोड स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर नसियाजी परिसर में संतों की साधना, धर्मप्रभावना और जैन धर्म की परंपराओं को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से नवनिर्मित आचार्यश्री ज्ञानसागर निलय संत निवास का उद्घाटन मंगलमय वातावरण में हुआ। कार्यक्रम आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनि श्री उपशांतसागरजी ससंघ के पावन सान्निध्य में किया गया। इस अवसर पर संतों के मंगल प्रवचनों का लाभ लेकर श्रद्धालुओं ने गुरु-भक्ति, धर्मरक्षा और समाज के प्रति अपने दायित्वों को समझने का संकल्प लिया। इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने सम्राट सिकंदर का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि मनुष्य धन-संपत्ति और सत्ता के अहंकार में दूसरों को तुच्छ समझने लगता है, लेकिन जीवन की वास्तविकता सामने आने पर बड़ी से बड़ी शक्ति भी असहाय हो जाती है। आचार्यश्री ने बताया कि विश्व विजेता बनने की आकांक्षा रखने वाला सम्राट सिकंदर एक बार भारत आया। उसके मन में संतों का सान्निध्य प्राप्त करने और धर्म को समझने की भावना जागृत हुई। जब उसे बताया गया कि संतों के दर्शन के लिए स्वयं उनके पास जाना होगा, तो उसने बिना संकोच जाने की सहमति दे दी। संतों के दर्शन के बाद वह अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गया।
धन का संग्रह करना ही जीवन का उद्देश्य नहीं
कुछ दूरी तय करने के बाद वह मरुस्थलीय क्षेत्र में पहुंचा, जहां उसे तेज प्यास लगने लगी। उसने अपने घुड़सवारों को पानी की तलाश में भेजा। तीन घुड़सवार खाली हाथ लौटे, जबकि चौथा एक बुजुर्ग व्यक्ति को लेकर आया, जिसके पास पानी से भरा एक लोटा था। बुजुर्ग ने पानी के बदले आधा राज्य देने की मांग की। प्यास से व्याकुल सिकंदर ने यह मांग स्वीकार कर ली। पानी पीने के बाद जब उसकी तबीयत बिगड़ी और पेट में दर्द होने लगा, तब वह एक छोटी-सी पुड़िया के लिए भी व्याकुल हो उठा, जिससे उसका दर्द ठीक हो सकता था। इस प्रसंग के माध्यम से आचार्यश्री ने समझाया कि जो सम्राट अपने साम्राज्य और वैभव के अहंकार में डूबा था, वही जीवन बचाने के लिए एक छोटी-सी पुड़िया के सामने विवश हो गया। उन्होंने कहा कि जिस धन-संपत्ति के लिए मनुष्य अहंकार करता है और दूसरों को तुच्छ समझता है, उसका वास्तविक मूल्य क्या है? धन का संग्रह करना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। मनुष्य को अपनी संपत्ति का सदुपयोग धर्म के आयतनों के निर्माण, धार्मिक गतिविधियों और जनकल्याण के कार्यों में करना चाहिए। धन-संपत्ति की सार्थकता उसके सदुपयोग में है, अहंकार में नहीं।
गुरु का सान्निध्य जीवन को देता है सही दिशा
मुनि श्री उपशांतसागरजी महाराज ने गुरु के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु का मार्गदर्शन व्यक्ति के जीवन को सही दिशा प्रदान करता है। गुरु-सान्निध्य में जीवन को संस्कारित करने का अवसर मिलता है और साधक आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। गुरु की प्रेरणा एवं धर्ममार्ग का अनुसरण जीवन के अंतिम समय में समाधिमरण को भी मंगलमय बनाने में सहायक हो सकता है। मुनिश्री ने कहा कि संत निवास का उद्देश्य केवल एक भवन का निर्माण करना नहीं है, बल्कि ऐसा पवित्र स्थान तैयार करना है, जहां संतों का निवास हो सके और वे अपनी साधना, धर्मचर्चा तथा जिनवाणी के अध्ययन में निरंतर संलग्न रह सकें। संतों की साधना के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना समाज का महत्वपूर्ण दायित्व है। उन्होंने कहा कि संत भवन के निर्माण के साथ-साथ संस्कारित संतान का निर्माण भी आवश्यक है। समाज को ऐसी पीढ़ी तैयार करनी चाहिए, जो धर्म की रक्षा करे और जैन धर्म की गौरवशाली परंपराओं को आगे बढ़ाए। संतों की सुरक्षा, उनके प्रवास और धर्मप्रभावना की निरंतरता के लिए समाज में धार्मिक स्थलों एवं आवश्यक व्यवस्थाओं का विकास होना चाहिए। संतों का चातुर्मास निरंतर होता रहे, इसके लिए समाज को समर्पित भाव से प्रयास करने चाहिए।
आचार्यश्री ज्ञानसागर निलय का हुआ भव्य उद्घाटन
नवनिर्मित आचार्यश्री ज्ञानसागर निलय संत निवास का आचार्यश्री उदारसागर महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में उद्घाटन हुआ । संत निवास का निर्माण नगर के श्रावक श्रेष्ठी महेशचंद्र जैन बंगाली अझेड़ा परिवार एवं पवन जैन इंडस्ट्रीज परिवार के विशेष सहयोग तथा सकल दिगम्बर जैन समाज की सहभागिता से संपन्न हुआ। संत निवास का उद्घाटन संतों के पावन सान्निध्य में श्रावक श्रेष्ठियों द्वारा किया गया। संचालन प्रतिष्ठाचार्य नवनीत जैन शास्त्री के मार्गदर्शन में किया गया। मंगलाचरण पदमचंद्र जैन चौधरी ने प्रस्तुत किया। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने संतों के प्रवचनों का लाभ लिया और धर्म, त्याग, गुरु-भक्ति तथा समाजसेवा के आदर्शों को जीवन में अपनाने की भावना व्यक्त की। संत निवास का निर्माण समाज की धार्मिक आस्था, सामूहिक सहयोग और संतों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक बना।




