मुरैना। आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में प्रवचन में रोचक प्रसंग के माध्यम से जीवन की अनिश्चितता, धर्म के प्रति जागरूकता और वर्तमान पुरुषार्थ का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य पूर्व जन्म के पुण्य के उदय से प्राप्त सुख-सुविधाओं का भोग करता है लेकिन, केवल पूर्व पुण्य के भरोसे जीवन नहीं चलाया जा सकता। भविष्य को संवारने के लिए वर्तमान में धर्म, संयम और शुभ पुरुषार्थ करना आवश्यक है। आचार्यश्री ने मुनिराज के आहार का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक बार दिगंबर मुनिराज जंगल से नगर की ओर आहारचर्या के लिए विहार कर रहे थे। उनके नगर में आने की सूचना मिलते ही श्रद्धालुओं में उत्साह छा गया। एक सेठ के घर मुनिराज का पड़गाहन हुआ और परिवार ने नवधाभक्ति पूर्वक आहार कराया। इसी दौरान सेठ की पुत्रवधू ने मुनिराज से पूछा-“महाराज जी, सुबह-सुबह कैसे आ गए?” मुनिराज ने सहज भाव से उत्तर दिया-“समय की खबर नहीं। इसके बाद मुनिराज ने परिवार के सदस्यों की उम्र पूछी। बहू ने अपनी उम्र तीन वर्ष, पति की एक वर्ष और सास की छह महीने बताई। वहीं ससुर के बारे में कहा कि वे तो “अभी पैदा ही नहीं हुए। मुनिराज ने पूछा-ताजा खाते हैं या बासा? बहू ने उत्तर दिया-बासा खाते हैं। मुनिराज के आहार करके चले जाने के बाद परिवार के सदस्यों ने बहू को समझाया कि उसने महाराज के सामने ऐसी बातें कहकर परिवार की बदनामी कराई है। बहू ने कहा कि उसने कोई गलत बात नहीं कही है। सभी उसके साथ मुनिराज के पास पहुंचे और इन बातों का अर्थ जानना चाहा।
पुरुषार्थ नहीं करोगे तो भविष्य के लिए नया पुण्य कैसे अर्जित होगा?
मुनिराज ने समझाया कि बहू के प्रत्येक उत्तर में गहरा आध्यात्मिक भाव छिपा था। तीन वर्ष का अर्थ था कि वह तीन वर्ष से धर्म से जुड़ी हुई है। पति का एक वर्ष अर्थात वह एक वर्ष से धर्म के मार्ग पर है जबकि, सास छह महीने से धर्म से जुड़ी हैं। ससुर के अभी पैदा नहीं होने का आशय यह था कि उनका अभी धर्म और आत्मकल्याण के प्रति जागरण नहीं हुआ है। मुनिराज ने बासा खाते हैं का अर्थ समझाते हुए कहा कि मनुष्य आज जिन सुख-सुविधाओं का उपभोग कर रहा है वे उसके पूर्व जन्म के पुण्य का परिणाम हैं। यदि वर्तमान जीवन में वह धर्म, दान, संयम, स्वाध्याय और शुभ कार्यों का पुरुषार्थ नहीं करेगा तो भविष्य के लिए नया पुण्य कैसे अर्जित होगा?
सेठ की थाली में मूंग की दाल का पानी और बिना घी की रोटी
आचार्यश्री ने एक अन्य प्रसंग के माध्यम से भी श्रद्धालुओं को जीवन की वास्तविकता समझाई। उन्होंने बताया कि एक सेठ के यहां भव्य आयोजन हुआ। सभी अतिथियों को स्वादिष्ट और विविध प्रकार के व्यंजन परोसे गए, लेकिन सेठ की अपनी थाली में मूंग की दाल का पानी और बिना घी की रोटी थी।
इस प्रसंग के माध्यम से आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में केवल भौतिक सुख-सुविधाएं जुटा लेना ही पर्याप्त नहीं है। जिस प्रकार शरीर को भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मा को धर्म, स्वाध्याय, संयम, सद्भाव और सदाचार का आहार चाहिए।
धर्म को कल पर मत टालिए
उन्होंने कहा कि मनुष्य बासी भोजन से तो बचने का प्रयास करता है, लेकिन मन में वर्षों पुराने क्रोध, मान, माया, लोभ और बैर को संजोकर रखता है। ऐसे भाव आत्मा को भीतर से अशांत करते हैं। इसलिए केवल भोजन ही नहीं, बल्कि अपने विचारों और भावों को भी प्रतिदिन ताजा, निर्मल और पवित्र बनाना चाहिए। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि समय की खबर नहीं है। पूर्व पुण्य से जो मिला है, उसका भोग करते हुए वर्तमान में नया धर्म और पुरुषार्थ करना मत भूलिए। धर्म को कल पर मत टालिए, क्योंकि कल आएगा या नहीं, इसकी किसी को खबर नहीं।





