श्रीफल की विशेष श्रृंखला में आज मिलिए खंडवा के अविनाश जैन परिवार से। इस परिवार की कहानी बताती है कि बच्चों को संस्कार केवल समझाने से नहीं, बल्कि अपने आचरण से भी दिए जाते हैं। बड़ों को रोज मंदिर जाते, अभिषेक-पूजन करते और साधु-संतों की सेवा में आगे रहते देखा तो बच्चों ने भी धर्म को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया।

दशलक्षण पर्व में यही संस्कार और गहरे दिखाई देते हैं। कोई तीन निर्जल उपवास करता है, कोई हॉस्टल का भोजन छोड़कर जैन भोजन अपनाता है, कोई होटल और ऑनलाइन भोजन का त्याग करता है तो कोई अपने काम का समय बदलकर धर्म-ध्यान के लिए समय निकालता है।

श्रीफल साथी सन्मति जैन काका से बातचीत में खंडवा के अविनाश जैन ने अपने परिवार की दस दिनों की दिनचर्या साझा की।

घर के पास मंदिर था, देवदर्शन बन गया रोज की जिंदगी का हिस्सा

अविनाश जैन कहते हैं कि जिनधर्म के संस्कार परिवार में जन्म से ही मिले, लेकिन खंडवा के सराफा बाजार स्थित करीब 100 वर्ष प्राचीन अतिशयकारी श्री पार्श्वनाथ जिन मंदिर के पास रहने का विशेष लाभ पूरे परिवार को मिला।

मंदिर पास था तो देवदर्शन के लिए अलग से योजना नहीं बनानी पड़ती थी। धीरे-धीरे मंदिर जाना रोज की दिनचर्या का हिस्सा बन गया। परिवार में छोटे से लेकर बड़े तक ने जिनदर्शन के बाद ही भोजन करने का नियम अपना लिया।

अविनाश कहते हैं कि मंदिर के आसपास रहते हुए बच्चों ने भी बचपन से पूजा, अभिषेक और धार्मिक वातावरण को बहुत करीब से देखा। यही बातें धीरे-धीरे उनके संस्कारों का हिस्सा बनती चली गईं।

सराफा व्यवसाय के साथ साधु-संतों की सेवा में भी सबसे आगे

अविनाश जैन खंडवा में सराफा व्यवसाय से जुड़े हैं, लेकिन उनकी दिनचर्या केवल व्यापार तक सीमित नहीं रही। नगर में जब भी साधु-संतों का आगमन होता है, वे उनकी सेवा और व्यवस्था में सबसे पहले आगे आने वालों में रहते हैं।

करीब 25 वर्षों से वे मुनि सेवा के पुण्य कार्य से जुड़े हैं। उनका मानना है कि इतने वर्षों तक साधु-संतों का सान्निध्य और सेवा का अवसर मिलने का प्रभाव केवल उनके जीवन पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार पर पड़ा है।

बच्चों ने भी घर के बड़ों को व्यापार और दूसरी जिम्मेदारियों के बीच धर्म तथा संत सेवा के लिए समय निकालते देखा। शायद इसीलिए उनके लिए धर्म कोई अलग गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनता गया।

2014 का चातुर्मास बना जीवन में बदलाव का पड़ाव

वर्ष 2014 अविनाश जैन के धार्मिक जीवन में विशेष बदलाव लेकर आया। चातुर्मास के दौरान आचार्य श्री विरागसगर जी की शिष्या आर्यिका 105 विदुषी श्री माताजी के संघस्थ क्षु.105 विभाषा श्री माताजी का सान्निध्य मिला और पिच्छिका प्राप्त होने के प्रसंग के बाद धर्म, त्याग और संयम को और नजदीक से समझने का अवसर मिला।

अविनाश बताते हैं कि इसके बाद उनकी जीवनचर्या में बड़ा परिवर्तन आया। पूजा-पाठ और देवदर्शन पहले भी थे, लेकिन अब धर्म को समझकर अपने व्यवहार और दिनचर्या में उतारने का पुरुषार्थ बढ़ गया। यही बदलाव दशलक्षण पर्व के दिनों में और स्पष्ट दिखाई देता है।

घर बदला, मंदिर से जुड़ाव नहीं बदला

करीब तीन वर्ष पहले परिवार नवकार नगर में रहने आया। घर और क्षेत्र बदल गया, लेकिन मंदिर और धर्म से जुड़ी दिनचर्या नहीं बदली।

अब परिवार नवकार नगर स्थित श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनालय से जुड़ा है। दशलक्षण में पूजन, पाठ, सामायिक, प्रतिक्रमण और स्वाध्याय के साथ शाम के धार्मिक कार्यक्रमों में भी परिवार सहभागिता करता है।

इस बार अविनाश जैन ने अपने जीवन में पहली बार निरंतर तीन निर्जल उपवास की साधना का पुरुषार्थ भी किया।

पत्नी वंदना के लिए पर्व के बाद भी जारी रहता है धर्म-ध्यान

अविनाश बताते हैं कि उनकी पत्नी वंदना जैन की धार्मिक दिनचर्या केवल दशलक्षण के दस दिनों तक सीमित नहीं है। वे सामान्य दिनों में भी नियमित रूप से सामायिक, प्रतिक्रमण और स्वाध्याय करती हैं।

धार्मिक प्रश्नोत्तरी हो या पूजा-विधान, वे हमेशा रुचि के साथ जुड़ी रहती हैं। दशलक्षण आते ही यही दिनचर्या और अधिक अनुशासित हो जाती है।

पिता और चाचा को देखकर बेटे भी पहुंचने लगे अभिषेक करने

अविनाश के छोटे भाई अंकित जैन कहते हैं कि जब घर के दोनों भाई नियमित जिनाभिषेक और पूजन करते हैं तो बच्चे भी उन्हें देखकर सीखते हैं।

बेटे मोक्षित और संचित छुट्टी के दिन सुबह अभिषेक करने मंदिर पहुंच जाते हैं। स्कूल के दिनों में समय नहीं मिल पाए तो सुबह या शाम अपनी सुविधा के अनुसार मंदिर जरूर जाते हैं।

यहां बच्चों को बार-बार यह कहने की जरूरत नहीं पड़ी कि मंदिर जाओ या देवदर्शन करो। उन्होंने घर के बड़ों को जो करते देखा, उसी को धीरे-धीरे अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया।

हॉस्टल में भी मोक्षित ने नहीं छोड़े घर से मिले संस्कार

संस्कारों की असली परीक्षा तब होती है, जब बच्चे परिवार से दूर होते हैं। इंदौर में हॉस्टल में रहने वाले पुत्र मोक्षित के सामने भी दशलक्षण में यही स्थिति आई।

घर से दूर होने के कारण वहां भोजन और दिनचर्या की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन उसने दशलक्षण पर्व के दौरान हॉस्टल के नियमित भोजन का त्याग कर जैन भोजन को प्राथमिकता दी।

शाम को भी सूर्यास्त से पहले फल आदि लेकर भोजन की मर्यादा बनाए रखने का प्रयास किया।

परिवार के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां नियम घर के बड़ों के कहने या उनकी निगरानी में नहीं निभाया जा रहा, बल्कि बच्चा खुद अपने संस्कारों के आधार पर निर्णय ले रहा है।

संचित और इनिका ने कहा—दस दिन बाहर का खाना नहीं

बेटे संचित और बेटी इनिका ने दशलक्षण के लिए अपनी उम्र और दिनचर्या के अनुसार अलग नियम बनाया।

दोनों ने होटल के भोजन और ऑनलाइन मंगाए जाने वाले खाने का त्याग कर घर के शुद्ध भोजन को ही अपनाने का संकल्प लिया।

आज जब बाहर का खाना और मोबाइल से भोजन ऑर्डर करना बच्चों और युवाओं की सामान्य जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है, ऐसे में दस दिनों के लिए अपनी इच्छा से उसे छोड़ना भी उनके लिए संयम का व्यावहारिक रूप है।

डॉक्टर बेटी अवनि ने धर्म के लिए बदला काम का समय

परिवार की बेटी डॉ. अवनि ऑनलाइन फिजियोथैरेपी के माध्यम से मरीजों को देखती हैं। उन्होंने भी दशलक्षण के लिए अपने काम में बदलाव किया।

पर्व के दौरान मरीजों को देखने का समय बदला और उनकी संख्या भी सीमित कर दी, ताकि व्यावसायिक जिम्मेदारी निभाने के साथ धर्म-ध्यान और धार्मिक क्रियाओं के लिए पर्याप्त समय निकल सके।

यानी परिवार के प्रत्येक सदस्य ने अपनी परिस्थिति के अनुसार दशलक्षण को जीवन में उतारने का रास्ता खोजा। किसी ने उपवास किया, किसी ने भोजन बदला, किसी ने बाहर का खाना छोड़ा तो किसी ने अपने काम का समय बदल दिया।

बच्चों को संस्कार कहकर नहीं, करके दिए

अविनाश जैन परिवार की कहानी में शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि यहां बच्चों को धर्म से जोड़ने के लिए केवल बातें नहीं की गईं। उन्होंने धर्म को अपने घर में होते हुए देखा है।

दादा-पिता को मंदिर जाते देखा, घर के बड़ों को अभिषेक-पूजन करते देखा, साधु-संतों के आगमन पर सेवा में आगे रहते देखा और मां को सामायिक, प्रतिक्रमण तथा स्वाध्याय करते देखा।

वही संस्कार अब बच्चों के अपने निर्णयों में दिखाई देने लगे हैं।

कोई हॉस्टल में रहकर भी जैन भोजन खोज रहा है, कोई ऑनलाइन भोजन छोड़ रहा है, कोई छुट्टी के दिन अभिषेक करने मंदिर जा रहा है और कोई अपने पेशे का समय बदलकर धर्म के लिए समय निकाल रहा है।

दशलक्षण के इन दस दिनों में अविनाश जैन परिवार की दिनचर्या यही बताती है—बड़ों से मिले संस्कार जब बच्चों के अपने नियम बन जाएं, तभी संस्कार वास्तव में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचते हैं।

श्रृंखला का उद्देश्य

श्रीफल की विशेष ‘दशलक्षण और निमाड़ के परिवार’ श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व के दिनों में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, आम दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा इस पर्व का परिवार और अगली पीढ़ी के संस्कारों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

कल फिर मिलेंगे निमाड़ के एक और परिवार से और जानेंगे कि दशलक्षण पर्व के दस दिनों में उनके घर की दिनचर्या कैसे बदलती है और बड़ों से मिले संस्कार बच्चों के जीवन में किस तरह दिखाई देते हैं।