श्रीफल की विशेष श्रृंखला में आज मिलिए सनावद के सुधीर जैन परिवार से, जहां दशलक्षण पर्व के दस दिनों में पूजा-पाठ के साथ भोजन और पूरी दिनचर्या में संयम बढ़ जाता है। श्रीफल के लिए सन्मति जैन काका ने सुधीर जैन से बातचीत कर परिवार की इन दस दिनों की दिनचर्या को जाना।

दशलक्षण पर्व के दस दिन किसी परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी में क्या बदलाव लाते हैं? सुबह कितने बजे दिन शुरू होता है, भोजन के नियम कैसे बदलते हैं और घर से दूर रहने वाले बच्चे इन दिनों धर्म और संयम से कैसे जुड़े रहते हैं?

इन्हीं सवालों को लेकर सन्मति जैन काका ने सनावद के सुधीर जैन से बातचीत की। सुधीर जैन ने बताया कि दशलक्षण पर्व उनके परिवार के लिए केवल दस दिन पूजा-पाठ करने का अवसर नहीं है। ये दस दिन सालभर से चले आ रहे धार्मिक नियमों को और मजबूत कर जाते हैं।

संतों से मिले संस्कार बने परिवार की जीवनशैली

सुधीर जैन बताते हैं कि उनके परिवार को आचार्य श्री विद्यासागर महाराज, आचार्य श्री वर्धमानसागर महाराज और गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य से संस्कार मिले हैं।

करीब 28 वर्ष पहले उनके पुत्र श्रेयांश जैन ने आचार्यश्री से दीक्षा ग्रहण की। परिवार में धर्म और संयम की जो भावना वर्षों से चली आ रही है, उसका प्रभाव आज भी परिवार की दिनचर्या में दिखाई देता है।

सुधीर जैन कहते हैं, “दशलक्षण पर्व हर बार एक नई दिशा देकर जाता है। हमारे जो नियम पहले से हैं, इन दस दिनों में वे और दृढ़ हो जाते हैं।”

सुबह छह बजे से मंदिर जाने लगते हैं परिवार के सदस्य

दशलक्षण के दिनों में घर की सुबह जल्दी हो जाती है। करीब छह बजे से परिवार के सदस्य मंदिर जाना शुरू कर देते हैं। वहां अभिषेक, पूजन और पाठ करते हैं। मंदिर की धार्मिक क्रियाएं पूरी होने के बाद ही घर आकर भोजन करते हैं।

सामान्य दिनों में भी परिवार सात्त्विक भोजन करता है, लेकिन इन दस दिनों में भोजन की शुद्धता और मर्यादा और बढ़ जाती है।

कोई एकासन करता है तो कोई उपवास

परिवार में सभी अपनी शक्ति और भावना के अनुसार नियम लेते हैं। कोई एकासन करता है, कोई उपवास रखता है तो कोई दो समय भोजन करता है। शाम छह बजे के बाद पानी का भी त्याग कर दिया जाता है।

सुधीर जी बताते हैं कि परिवार में वर्षों से धार्मिक वातावरण होने के कारण ये नियम कठिन नहीं लगते। दस दिन आते हैं तो परिवार के सदस्य सहज रूप से अपनी दिनचर्या को संयम के अनुसार ढाल लेते हैं।

शाम होते ही फिर धर्म से जुड़ता है परिवार

दिन की शुरुआत मंदिर से होती है तो शाम प्रवचन के साथ बीतती है। पूरा परिवार प्रवचन सुनने जाता है। इन दिनों ब्रह्मचारी संजय भैया सनावद आए हुए हैं, इसलिए परिवार उनके प्रवचनों का लाभ ले रहा है।

इस तरह सुबह अभिषेक-पूजन से शुरू हुई धर्म-साधना शाम को प्रवचन और धर्मचर्चा तक चलती है।

बच्चे महानगरों में, लेकिन संस्कार आज भी घर वाले

इस परिवार की सबसे प्रेरक बात बच्चों की दिनचर्या में दिखाई देती है। परिवार के बच्चे शिक्षा और नौकरी के कारण महानगरों में रहते हैं। घर से दूर और व्यस्त जीवन के बावजूद दशलक्षण आते ही वे अपने नियम नहीं भूलते।

वे जहां भी रहते हैं, इन दिनों रात्रि भोजन का त्याग करते हैं, प्रतिदिन देवदर्शन करते हैं और सात्त्विक भोजन के साथ संयम के नियमों का पालन करते हैं।

यानी सनावद के घर में मिले संस्कार बच्चों के साथ महानगरों तक पहुंचे हैं।

दस दिन, जो सालभर के संस्कार और मजबूत कर जाते हैं

सुधीर जैन परिवार की दिनचर्या बताती है कि संस्कार केवल कहने से अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचते, वे घर के व्यवहार और दिनचर्या में दिखाई देने चाहिए।

दशलक्षण के दस दिनों में मंदिर, पूजन, एकासन, उपवास, सात्त्विक भोजन, पानी का त्याग और प्रवचन—ये सभी परिवार को अपने नियमों के प्रति फिर से सजग करते हैं।

यही कारण है कि सुधीर जैन के शब्दों में दशलक्षण पर्व हर वर्ष एक नई दिशा देकर जाता है और पहले से चले आ रहे नियमों को और दृढ़ कर जाता है।

कल फिर मिलेंगे निमाड़ के एक और परिवार से और जानेंगे कि दशलक्षण के दस दिनों में उनके घर की दिनचर्या कैसे बदलती है।

श्रृंखला का उद्देश्य

श्रीफल की इस विशेष  दशलक्षण और निमाड़ के परिवार  ” श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व के दिनों में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, आम दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा इस पर्व का परिवार और जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।

कल मिलेंगे एक और परिवार से, जो बताएगा कि दशलक्षण पर्व उनके घर में किस तरह

आत्मशुद्धि, संस्कार और अनुशासन का वातावरण बनाता है।