श्रीफल की विशेष श्रृंखला ‘दस दिन–दस परिवार’ में आज मिलिए तल्लीन बड़जात्या परिवार से

दशलक्षण महापर्व में पूजा के दौरान हम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य जैसे दस धर्मों की आराधना करते हैं, लेकिन इन धर्मों को अपने व्यवहार और दिनचर्या में कितना उतार पाते हैं? श्रीफल समूह की संपादक रेखा संजय जैन से विशेष बातचीत में तल्लीन बड़जात्या ने अपने परिवार की ऐसी ही कोशिशों को साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में दशलक्षण के दस दिन केवल मंदिर, पूजा और धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहते। परिवार प्रत्येक धर्म के भाव को समझकर उसके अनुरूप अपने जीवन में छोटा-सा परिवर्तन या त्याग करने का प्रयास करता है।

तल्लीन बड़जात्या बताते हैं कि पर्व के इन दस दिनों में उनकी स्वयं की दिनचर्या भी बदल जाती है। सामान्य दिनों में प्रतिदिन अभिषेक के लिए मंदिर पहुंचना संभव नहीं हो पाता, लेकिन दशलक्षण में उन्होंने दस दिनों में दस अलग-अलग जिनालयों में जाकर शांतिधारा करने का संकल्प लिया है। प्रतिदिन अलग मंदिर में अभिषेक-पूजन और शांतिधारा के साथ वे उस दिन के धर्म के भावार्थ को समझने की कोशिश करते हैं। उनके अनुसार पूजा पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है, पूजा में जो कहा जा रहा है उस पर विचार करना भी जरूरी है। कई बार पूजा का अर्थ पढ़ते हुए व्यक्ति को स्वयं अनुभव होता है कि जिन बातों को छोड़ने की प्रेरणा धर्म दे रहा है, वे हमारे व्यवहार में अब भी मौजूद हैं। यही आत्मचिंतन धीरे-धीरे बदलाव की दिशा दिखाता है।

रेखा संजय जैन से बातचीत में तल्लीन बड़जात्या ने त्याग धर्म का उदाहरण देते हुए बताया कि त्याग को केवल भोजन के त्याग तक सीमित नहीं समझना चाहिए। व्यक्ति अपनी सुविधाओं और आदतों में भी कमी कर सकता है। इसी भावना से त्याग धर्म के दिन वे सुबह से शाम तक एक ही जोड़ी वस्त्र में रहने का नियम लेते हैं। सामान्य जीवन में आवश्यकता से अधिक बार कपड़े बदलने जैसी छोटी आदत पर भी नियंत्रण करना उनके लिए त्याग की भावना को व्यवहार में लाने का एक तरीका है। इसी प्रकार दस धर्मों में जो भाव सामने आता है, परिवार अपनी क्षमता के अनुसार उसे जीवन में उतारने का प्रयास करता है।

इस धार्मिक वातावरण का असर परिवार की नई पीढ़ी पर भी दिखाई देता है। बातचीत में तल्लीन बड़जात्या ने अपने साढ़े चार वर्ष के पोते का विशेष उल्लेख किया। इतनी छोटी उम्र में वह घर के मंदिर में णमोकार मंत्र बोलता है, दीपक लगाता है और उसे याद स्तोत्रों का पाठ करता है। शाम को दादा के साथ मंदिर जाकर बैठता है और पूजा बोलता है। घर पर भक्तामर स्तोत्र तथा ‘प्रभुपतित पावन’ का पाठ सुनने और याद करने में भी उसकी रुचि है। परिवार के अनुसार उसे भक्तामर स्तोत्र का काफी हिस्सा कंठस्थ हो चुका है।

पोते से जुड़ा एक और प्रसंग तल्लीन बड़जात्या ने विशेष रूप से साझा किया। दशलक्षण पर्व में बाहर का और अभक्ष्य भोजन न लेने के संस्कार को उसने अपने स्कूल तक पहुंचाया। परिवार की ओर से स्कूल प्रबंधन से दशलक्षण के दौरान जैन भोजन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। खास बात यह रही कि बच्चा केवल स्वयं जैन भोजन लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अपने साथ पढ़ने वाले बच्चों को भी इसके लिए प्रेरित करने लगा। तल्लीन बड़जात्या इसे बच्चों को उपदेश देने के बजाय घर के आचरण से संस्कार मिलने का उदाहरण मानते हैं।

बड़जात्या परिवार में इन दस दिनों के दौरान बाहर का भोजन पूरी तरह बंद रहता है। परिवार का कोई सदस्य दूसरे शहर में भी हो तो प्रयास यही रहता है कि होटल या बाहर के भोजन के बजाय किसी परिचित परिवार के यहां शुद्ध भोजन की व्यवस्था हो। तल्लीन बड़जात्या ने बातचीत में बताया कि उनका बेटा इन दिनों हैदराबाद में है, वहां भी उसके भोजन की व्यवस्था परिचित परिवार के यहां की गई है। स्वास्थ्य और व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण परिवार के सभी सदस्य एक जैसे कठिन नियम नहीं लेते, लेकिन शुद्ध और घर का भोजन करने का नियम प्रमुखता से निभाया जाता है। उनकी पत्नी दस दिनों तक एक समय भोजन करती हैं।

परिवार की धर्म-साधना केवल घर तक सीमित नहीं है। तल्लीन बड़जात्या की माताजी हर वर्ष दशलक्षण पर्व किसी तीर्थ क्षेत्र में रहकर करने का प्रयास करती हैं और इस बार वे उज्जैन के तपोभूमि तीर्थ क्षेत्र में रहकर धर्म आराधना कर रही हैं। वहीं घर पर परिवार के सदस्य अपने-अपने नियमों के साथ पर्व मनाते हैं। समय के कारण मंदिर में सामायिक संभव न होने पर तल्लीन घर पर ही रिकॉर्डेड पाठ के माध्यम से विधिपूर्वक सामायिक करते हैं। शाम को परिवार किसी न किसी जिनालय में आरती और उसके बाद होने वाले धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल होता है।

रेखा संजय जैन और तल्लीन बड़जात्या की बातचीत में एक महत्वपूर्ण बात बार-बार उभरकर आई कि दशलक्षण का प्रभाव तभी स्थायी बनता है, जब पूजा में पढ़े गए धर्म को परिवार अपने व्यवहार से जोड़ने की कोशिश करे। हर सदस्य की क्षमता अलग हो सकती है—कोई एक समय भोजन कर सकता है, कोई उपवास, कोई अपनी किसी सुविधा का त्याग कर सकता है और छोटा बच्चा भी शुद्ध भोजन या पूजा का नियम अपना सकता है। जरूरी यह है कि इन दस दिनों की साधना का कुछ अंश शेष वर्ष के जीवन में भी साथ रहे।

बड़जात्या परिवार में यही प्रयास तीन पीढ़ियों में अलग-अलग रूप में दिखाई देता है—माताजी तीर्थ क्षेत्र में साधना कर रही हैं, तल्लीन अलग-अलग जिनालयों में शांतिधारा और दस धर्मों को व्यवहार में उतारने का संकल्प निभा रहे हैं और साढ़े चार वर्ष का पोता अपने स्कूल तक जैन भोजन और धार्मिक संस्कारों की भावना पहुंचा रहा है। इस तरह दशलक्षण के दस दिन इस परिवार के लिए केवल पर्व नहीं, बल्कि संस्कारों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने और धर्म को दैनिक जीवन से जोड़ने का माध्यम बन जाते हैं।