श्रीफल की विशेष श्रृंखला ‘दस दिन–दस परिवार’ में आज मिलिए विमल झांझरी परिवार से।
दशलक्षण महापर्व के दस दिन विमल झांझरी परिवार के लिए केवल पूजा-पाठ या मंदिर जाने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इन दिनों घर के प्रत्येक सदस्य की दिनचर्या, भोजन और व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देता है। बच्चे हों, युवा हों या परिवार के बड़े सदस्य—हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार पूजा, सामायिक, एकासन, उपवास और त्याग के नियमों से जुड़ने का प्रयास करता है।
श्रीफल की समूह संपादक रेखा जैन से विशेष बातचीत में विमल झांझरी ने बताया कि सामान्य दिनों की तुलना में दशलक्षण पर्व के दौरान पूरा परिवार धर्ममय वातावरण में रहता है। सुबह से लेकर शाम तक मंदिर दर्शन, पूजन, स्वाध्याय, आरती और प्रवचन का क्रम चलता है। परिवार के सदस्य दिन की शुरुआत जिनेंद्र भगवान के दर्शन और पूजा से करते हैं तथा भोजन से पहले धार्मिक क्रियाओं को प्राथमिकता देते हैं।
मंदिर दर्शन के बाद स्कूल की बस में बैठते हैं बच्चे
बातचीत में विमल झांझरी ने बताया कि सामान्य दिनों में बच्चे सुबह जल्दी स्कूल चले जाते हैं और प्रतिदिन मंदिर जाना संभव नहीं हो पाता। दशलक्षण पर्व के दिनों में उनकी दिनचर्या बदल जाती है। बच्चे सुबह पहले मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करते हैं और उसके बाद ही स्कूल की बस में बैठते हैं।
विद्यालय में उन्हें कोई खाद्य सामग्री दी जाती है तो वे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि उनके यहां दशलक्षण पर्व चल रहा है और उन्हें केवल जैन भोजन ही चाहिए। आलू, प्याज अथवा अभक्ष्य सामग्री से बने भोजन को वे स्वीकार नहीं करते। परिवार का मानना है कि जब बच्चों को घर से सही संस्कार और नियमों का अभ्यास मिलता है, तो वे बाहर भी सहजता के साथ उनका पालन कर पाते हैं।
चिप्स, चॉकलेट और बाजार की चीजों का त्याग
दशलक्षण पर्व के दौरान बच्चे बाजार से मिलने वाले चिप्स, चॉकलेट, टॉफी और अन्य पैकेटबंद खाद्य पदार्थों से भी दूरी रखते हैं। सामान्य दिनों में बच्चों को इन वस्तुओं के प्रति आकर्षण रहता है, लेकिन पर्व के दस दिनों में वे स्वयं इन्हें लेने से बचते हैं।
परिवार में रात के समय भोजन का भी विशेष त्याग किया जाता है। बच्चों को आवश्यकता होने पर दूध या पानी दिया जाता है, लेकिन घर के बड़े सदस्य सूर्यास्त के बाद जल और भोजन तक का त्याग करने का प्रयास करते हैं। शाम छह बजे के बाद परिवार के अधिकांश सदस्य पानी भी ग्रहण नहीं करते।
छुट्टी के दिन पूजन में होती है बच्चों की सहभागिता
विमल झांझरी ने बातचीत में बताया कि जिस दिन स्कूल की छुट्टी होती है, उस दिन बच्चे भी पूरी श्रद्धा से मंदिर जाकर पूजन करते हैं। वे पक्षाल, अभिषेक और पूजा में सहभागिता करते हैं। हाल ही में भगवान पुष्पदंतनाथ के निर्वाण कल्याणक के अवसर पर बच्चों ने मंदिर पहुंचकर पूजन किया और निर्वाण लाडू भी चढ़ाया।
परिवार के लिए यह विशेष संतोष का विषय है कि बच्चे केवल बड़ों को देखकर मंदिर नहीं जाते, बल्कि वे स्वयं पूजा बोलने, दर्शन करने और धार्मिक आयोजनों में शामिल होने की रुचि रखते हैं।
परिवार में एकासन, उपवास और सामायिक के नियम
झांझरी परिवार में प्रत्येक सदस्य अपनी शक्ति और स्वास्थ्य के अनुसार नियम लेता है। कोई एकासन करता है, कोई उपवास रखता है और कोई अन्य प्रकार का संयम पालन करता है। परिवार में पहले पूजन-पाठ और धर्म आराधना की जाती है, उसके बाद ही भोजन ग्रहण किया जाता है।
विमल झांझरी ने बताया कि परिवार में उनके बेटे, बहू और अन्य सदस्य भी दशलक्षण के दौरान पूजा और व्रत से जुड़े रहते हैं। सुबह की धार्मिक क्रियाओं के साथ शाम को सामायिक, आरती और शास्त्र प्रवचन में जाना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है।
सिद्धांतसागर महाराज के सान्निध्य में आराधना
दशलक्षण पर्व के दौरान झांझरी परिवार सुदामा नगर में विराजमान मुनि श्री सिद्धांतसागर महाराज के सान्निध्य और मंगल प्रवचनों का लाभ ले रहा है। परिवार के सदस्य सुबह-शाम उनके प्रवचन सुनने और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने का प्रयास करते हैं।
विमल झांझरी के अनुसार संतों का सान्निध्य पर्व की साधना को अधिक प्रेरणादायी बनाता है। प्रवचनों से दस धर्मों का अर्थ समझने और उन्हें जीवन में उतारने की प्रेरणा मिलती है।
बच्चों से बड़ों तक धर्म से जुड़ा पूरा परिवार
रेखा जैन से बातचीत में विमल झांझरी ने कहा कि दशलक्षण पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इन दस दिनों में पूरा परिवार धर्म से जुड़ जाता है। बच्चों से लेकर बड़े सदस्यों तक सभी के खान-पान, समय और दिनचर्या में अनुशासन आता है।
सामान्य दिनों में काम, स्कूल और अन्य जिम्मेदारियों के कारण परिवार के सभी सदस्य एक साथ धर्म आराधना नहीं कर पाते, लेकिन पर्व के दौरान सभी धर्म के लिए समय निकालते हैं। घर में भोजन और बाजार की वस्तुओं पर नियंत्रण रहता है, मंदिर जाने की नियमितता बढ़ती है और बच्चों को भी संयम तथा शुद्ध भोजन के संस्कार मिलते हैं।
झांझरी परिवार की दिनचर्या यह संदेश देती है कि दशलक्षण पर्व केवल दस दिनों तक मनाया जाने वाला धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि परिवार को एक साथ धर्म, अनुशासन और संस्कारों से जोड़ने का अवसर है। इन दिनों अपनाए गए छोटे-छोटे नियम बच्चों में स्थायी संस्कार बन सकते हैं और बड़ों को भी अपने व्यवहार तथा आदतों पर विचार करने की प्रेरणा देते हैं।
श्रृंखला का उद्देश्य
श्रीफल की इस विशेष “दस दिन–दस परिवार” श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व के दिनों में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, आम दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा इस पर्व का परिवार और जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
कल मिलेंगे एक और परिवार से, जो बताएगा कि दशलक्षण पर्व उनके घर में किस तरह आत्मशुद्धि, संस्कार और अनुशासन का वातावरण बनाता है।




