कुण्डलपुर। दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत उत्तम शौच धर्म की आराधना के साथ नवम तीर्थंकर भगवान पुष्पदंतनाथ का मोक्ष कल्याणक भक्तिभाव से मनाया गया। प्रातः भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा के बाद पर्व पूजन हुआ। श्री सम्मेदशिखर की सुप्रभ कूट का स्मरण करते हुए श्रद्धालुओं ने निर्वाण लाडू समर्पित किया।

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर तीर्थ प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि देश के विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालु प्रतिदिन पूजन, स्वाध्याय, साधना एवं संस्कार शिविर में सहभागी होकर आत्मशुद्धि की साधना कर रहे हैं।

‘दशलक्षण आत्मा की आराधना का पर्व’

निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि दशलक्षण महापर्व आत्मा की आराधना का पर्व है। इन दिनों आत्मा के विशुद्ध गुणों की आराधना की जाती है। ये गुण किसी व्यक्ति, घटना या स्थान से बंधे नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तम क्षमा में क्रोध को समझकर क्षमा की ओर बढ़ते हैं, मार्दव में अहंकार को पहचानकर विनम्रता और आर्जव में माया के जाल से निकलकर सरलता का मार्ग चुनते हैं। उत्तम शौच अपने भीतर की पवित्रता को पहचानकर उस पर जमा विकारों की गंदगी हटाने की प्रेरणा देता है।

‘कचरे के नीचे छिपा हो सकता है रत्न’

मुनि श्री ने बुंदेलखंडी भाषा के ‘घूरा’ शब्द का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां कचरा एकत्र होता है उसे घूरा कहते हैं। केवल ऊपर का कचरा देखकर यह मान लेना उचित नहीं कि उसके नीचे भी कचरा ही होगा। उसे हटाने और खुदाई करने पर भीतर कोई मूल्यवान वस्तु या रत्न भी मिल सकता है।

इसी प्रकार अपने ऊपर जमा विकारों को देखकर स्वयं को अशुद्ध मान लेना भूल है। आत्मा के भीतर अनंत गुणों का खजाना है, आवश्यकता उस पर जमा विकारों के कचरे को हटाने की है।

जितना गहरा संस्कार, उतना अधिक पुरुषार्थ

मुनि समतासागर जी ने कहा कि अलग-अलग प्रकार की गंदगी साफ करने के साधन भी अलग होते हैं। हाथ पर धूल हो तो पानी पर्याप्त है, चिकनाई के लिए साबुन चाहिए और गहरी गंदगी के लिए अधिक प्रभावी साधन की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार आत्मा पर जमे कषाय और संस्कारों की गहराई के अनुसार जागरण, साधना और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। कुछ संस्कार यथार्थ बोध और चेतना जागने पर कमजोर हो सकते हैं, जबकि गहरी कषायों को समाप्त करने के लिए निरंतर आत्मसाधना जरूरी है।

‘बाहर स्नान से शरीर, जिनवाणी से भीतर की मलिनता दूर करें’

मुनि श्री ने कहा कि नदियों में बार-बार स्नान करके शरीर को स्वच्छ किया जा सकता है, लेकिन भीतर की मलिनता केवल पानी से दूर नहीं हो सकती। इसके लिए जिनवाणी की गंगा में स्नान करना होगा।

जिनवाणी का स्वाध्याय, चिंतन और आत्मसाधना मन की अशांति तथा कषायों से उत्पन्न तपन को शांत करने में सहायक बनती है। यही साधना व्यक्ति को अपने भीतर देखने और विकारों को पहचानने की दिशा देती है।

क्रोध विवेक, मान विनय और माया विश्वास को करती है प्रभावित

कषायों के प्रभाव को समझाते हुए मुनि श्री ने कहा कि क्रोध के आवेश में व्यक्ति विवेक खो बैठता है। मान के कारण वह दूसरों की बात सुनना नहीं चाहता, जबकि माया और छल-कपट जीवन की प्रामाणिकता एवं विश्वास को कमजोर करते हैं। लोभ संतोष, संबंधों और प्रतिष्ठा तक को प्रभावित करता है।

उन्होंने कहा, “क्रोध प्रीति को, मान विनय को और माया विश्वास को नष्ट करती है।” इसलिए उत्तम शौच की साधना केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि इन कषायों को पहचानकर कम करने का पुरुषार्थ है।

‘अभिमान नहीं करें, स्वाभिमान नहीं खोएं’

मुनि श्री ने अभिमान और स्वाभिमान का अंतर समझाते हुए कहा कि अभिमान कभी नहीं करना चाहिए, लेकिन स्वाभिमान कभी नहीं खोना चाहिए।

स्वाभिमानी व्यक्ति व्यवहार में विनम्र रहता है, दूसरों का सम्मान करता है, लेकिन धर्म, सिद्धांत और मूल्यों के प्रश्न पर दृढ़ रहता है। अपने धर्म, परिवार, समाज और सिद्धांतों के प्रति स्वाभिमान बनाए रखना जीवन में महत्वपूर्ण है।

मन पवित्र हो तो बदल जाती है संसार को देखने की दृष्टि

मुनि समतासागर जी ने कहा कि शुचिता केवल बाहर की सफाई का नाम नहीं, बल्कि दृष्टि की निर्मलता भी है। मन के विकार कम होने पर दूसरों के प्रति विरोध और परायापन भी कम होने लगता है।

उन्होंने कहा, “जब अपना मन पवित्र होता है, हर चेहरे पर अपना चित्र होता है। फिर दुनिया के किसी भी कोने में चले जाओ, जो भी मिलता है, वह अपना ही मित्र दिखाई देता है।”

मुनि श्री ने इसे भगवान महावीर की मैत्रीपूर्ण दृष्टि बताते हुए कहा कि मन की पवित्रता स्वयं को निर्मल करने के साथ संसार को देखने का नजरिया भी बदल देती है।

पूजा-अनुष्ठान के साथ जीवन में उतरें धर्म के गुण

उन्होंने कहा कि दशलक्षण महापर्व का उद्देश्य केवल पूजा और अनुष्ठान पूरे करना नहीं है। क्रोध, मान, माया और लोभ के संस्कारों को पहचानकर कमजोर करना, भीतर की मलिनता दूर करना और आत्मा की स्वाभाविक शुद्धता की ओर लौटना ही उत्तम शौच धर्म की सार्थक आराधना है।