कुण्डलपुर। जीवन में सफलता के लिए मन की एकाग्रता, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास आवश्यक हैं। यह उद्गार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी ने कुंडलपुर में बड़े बाबा के चरणों का अभिषेक के पूर्व धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा कि हार-जीत खेल का हिस्सा है, लेकिन लक्ष्य प्राप्त करने से पहले हार मान लेना मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां कैसी भी हों, मन का उत्साह बनाए रखना चाहिए। गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज द्वारा रचित दोहों पर आधारित प्रातःकालीन स्वाध्याय सभा में उन्होंने कहा कि भगवान को मानने के साथ उनके सिद्धांतों को जीवन में अपनाना भी जरूरी है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने जीवन को खेल के मैदान से जोड़ते हुए धर्म, संयम और संकल्प का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि जैन परंपरा में गृहस्थों के लिए श्रावकाचार तथा गृहत्यागियों के लिए मूलाचार निर्धारित है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार छोटे-छोटे नियमों से शुरुआत कर सकता है। जिस प्रकार छोटा बीज विशाल वटवृक्ष बनता है, उसी प्रकार छोटा संकल्प दृढ़ता से पालन करने पर जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। मुनि श्री ने मछुआरे की शास्त्रीय कथा के माध्यम से बताया कि एक व्यक्ति ने पहली मछली को अभयदान देने का नियम लिया और कठिन परिस्थिति में भी उसका पालन किया।
जिम्मेदारियां निभाते हुए भी धर्म, नियम और संयम का पालन करें
कथा के अनुसार, उसके संकल्प, दृढ़ता और शांत भाव के प्रभाव से देवायु का बंध हुआ। उन्होंने कहा कि नियमों का पालन केवल अनुकूल परिस्थितियों में नहीं, बल्कि परीक्षा की घड़ी में भी होना चाहिए। घर में त्याग और बाहर सुविधा के अनुसार छूट लेना संयम की भावना के विपरीत है। आचार्य श्री के दोहों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन का मोल समझना चाहिए। धर्मज्ञान, शास्त्र स्वाध्याय और गुरु-संगति से जीवन की वास्तविकता समझ में आती है। गृहस्थ अपनी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां निभाते हुए भी धर्म, नियम और संयम का पालन कर सकता है। आवश्यकता मन को तैयार करने और अपनी क्षमता के अनुसार संकल्प लेकर उसे दृढ़ता से निभाने की है, जो दृढ़तापूर्वक नियम का पालन करता है वह एक दिन मोक्ष पद को ग्रहण करता है। मुनि श्री के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः बड़े बाबा के यहां मंच पर 7.30 बजे से प्रारंभ हो जाते है तत्पश्चात अभिषेक शांतिधारा पूजन विधान आदि क्रियाएं संपन्न होती है।





