धरियावद। 48 दिवसीय भक्तामर विधान आराधना के 36वें दिन दस पुण्यार्जक परिवारों ने भक्ति भाव एवं संगीतमय वातावरण में 48 अर्घ समर्पित किए।

साधु समाधि भावना

विधान के बाद आचार्य कल्प पुण्यसागरजी महाराज ने सोलहकारण पर्व के अंतर्गत साधु समाधि भावना पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तीर्थंकर पद की प्राप्ति के लिए सोलह भावनाओं का चिंतन-मनन आवश्यक है।

अंतिम समय आत्मभाव में रहे

आचार्यश्री ने कहा कि साधु प्रतिदिन समाधि भावना का चिंतन करते हैं, ताकि अंतिम समय में भी मन एकाग्र रहे और आत्मभाव बना रहे। समाधिमरण की भावना गृहस्थ जीवन से ही प्रारंभ होती है और व्रत, संयम, तप तथा साधना के माध्यम से आगे बढ़ती है।

अंत भला तो सब भला

उन्होंने कहा कि “अंत भला तो सब भला।” जीवनभर किए गए तप, संयम और साधना का सार अंतिम समय में आत्मभाव में स्थित होना है। अंतिम क्षण संसार की चिंता में नहीं, बल्कि भगवान और गुरु की शरण में बीतना चाहिए।

भवसागर से पार की विद्या

आचार्यश्री ने कहा कि संसार में जल और पृथ्वी पर चलने की अनेक विद्याएं हैं, लेकिन भवसागर से पार कराने वाली भवतरणी विद्या देव, शास्त्र और गुरु की शरण में ही प्राप्त होती है।

श्रद्धालुओं को प्रेरणा

उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं से जीवनभर ऐसी भावना रखने का आह्वान किया कि अंतिम श्वास भी प्रभु का स्मरण करते हुए आत्मभाव में बीते। यही सच्ची साधना और समाधिमरण की भावना है।