इंदौर। राष्ट्रसंत एवं राजकीय अतिथि मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने दलाल बाग में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए गृहस्थों को संदेश दिया कि संतान को केवल संपत्ति देकर जाना पर्याप्त नहीं है। सच्ची विरासत संपत्ति से पहले आचार और विचार की होती है। बच्चों को जीवन जीने की कला, संस्कार, हुनर, निर्णय लेने की क्षमता, आत्मविश्वास और स्वावलंबन देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि धन समाप्त हो सकता है और संपत्ति छिन सकती है, लेकिन संस्कार और हुनर जीवनभर व्यक्ति को संभाल सकते हैं। माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को ऐसी विरासत दें, जिससे वे जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी पीछे न रहें।

लोकोदय तीर्थ क्षेत्र कमेटी ने गुरुदेव के समक्ष रखा संकल्प

इस अवसर पर लोकोदय तीर्थ क्षेत्र कमेटी, आगरा के अध्यक्ष श्री निर्मल जैन मोठिया, महामंत्री एवं जिनवाणी चैनल के सीएमडी नीरज जैन तथा कोषाध्यक्ष श्री रूपेश जी सहित संस्था के प्रतिनिधियों ने पूज्य गुरुदेव के समक्ष श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

नीरज जैन जिनवाणी ने कहा कि लोकोदय तीर्थ क्षेत्र कमेटी तीर्थ के निर्माण के लिए संकल्पबद्ध है।

देश-विदेश से पहुंचे अतिथियों का स्वागत

अहमदाबाद से पधारे श्री विनय जी एवं श्रीमती आभा जी जैन, प्रमुख उद्योगपति श्री नवीन कुमार जी एवं श्रीमती अलका जी, दिगंबर जैन समाज बड़ौदिया-बागड़िया से श्री मनीष जी जैन एवं श्री पवित्र जी जैन तथा अमेरिका से पधारे श्री अशोक जी सेठी सहित अन्य अतिथियों का स्वागत किया गया।

चक्रवर्ती अध्यक्ष श्री नवीन जी गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष श्री आनंद जी गोधा एवं महोत्सव अध्यक्ष श्री अशोक जी डोशी ने अतिथियों का अभिनंदन किया।

33वें श्रावक संस्कार शिविर की व्यापक तैयारियां

मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने बताया कि परम पूज्य राष्ट्रसंत मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के सान्निध्य में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र की गुरुकुल परंपरा के अनुरूप 33वें श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन इंदौर में होने जा रहा है।

शिविर प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया एवं विनोद भैया के मार्गदर्शन तथा हुकुम काका कोटा एवं दिनेश जी गंगवाल के निर्देशन में 16 से 26 सितंबर तक आयोजित होगा। इसमें देशभर से श्रावक श्रेष्ठियों के प्रतिनिधि फॉर्म के माध्यम से सम्मिलित हो रहे हैं।

भगवान के दास नहीं, आध्यात्मिक सहभागी बनें

महाराज श्री ने कहा कि भगवान को अपना नाथ मानना चाहिए, लेकिन स्वयं को केवल दास समझकर निष्क्रिय नहीं बैठना चाहिए। भगवान ने जिस पूर्णता को प्राप्त किया है, उसी दिशा में हमें भी पुरुषार्थ करना है।

उन्होंने कहा कि केवल भक्तामर, समयसार या अन्य शास्त्र पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। आचार्यों के ज्ञान को पढ़ने के बाद अपनी बुद्धि, चिंतन और अनुभव से उसे अपना ज्ञान बनाना आवश्यक है। ज्ञान होना और ज्ञानी होना अलग बात है।

भगवान का नाम लेना ही भक्ति नहीं, बल्कि भगवान के विचारों को अपने विचार और उनके गुणों को अपने जीवन का लक्ष्य बनाना सच्ची भक्ति है।

णमोकार मंत्र से भय नहीं, विश्वास जगाएं

मुनि श्री ने णमोकार मंत्र की महिमा बताते हुए कहा कि मंत्र केवल भय के समय पढ़ने की वस्तु नहीं है। मंत्र के प्रति ऐसा विश्वास होना चाहिए, जो व्यक्ति के भीतर निर्भयता पैदा करे।

व्यक्ति में यह भाव जागना चाहिए कि मैं अनाथ नहीं हूं, मेरा नाथ है, मेरा गुरु है, मेरा धर्म है, मेरे पास णमोकार मंत्र है और मेरे भीतर आत्मशक्ति है। यही विश्वास विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है।

आत्मा और शरीर के भेद को समझें

महाराज श्री ने आत्मा और शरीर का भेद समझाते हुए कहा कि शरीर को चोट लग सकती है, लेकिन आत्मा का वास्तविक स्वरूप उससे परे है। जिसे तलवार काटती है, वह ‘मैं’ नहीं हूं और जो वास्तविक ‘मैं’ हूं, उसे तलवार काट नहीं सकती।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह शारीरिक पीड़ा को नकारने की बात नहीं, बल्कि आत्मा को शरीर से भिन्न जानने की उच्च आध्यात्मिक साधना की ओर संकेत है।

‘उसका मुंह है, लेकिन कान तुम्हारे हैं’

महाराज श्री ने कहा कि दूसरा व्यक्ति क्या बोलता है, यह हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होता, लेकिन उसकी बात को हम अपने मन में कितना स्थान देते हैं, यह हमारे हाथ में है। किसी की निंदा या कटु वचन से अपने भीतर की शांति नष्ट नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने आत्मचिंतन के लिए प्रश्न दिए कि मेरे जीवन को देखकर कौन धर्म की ओर प्रभावित हुआ, मेरी पूजा देखकर किसका मन पूजा करने को प्रेरित हुआ, मेरे त्याग को देखकर किसमें त्याग का भाव जागा और मेरे व्यवहार से किसे निर्भयता एवं सहारा मिला। यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता तो यही हमारी अगली साधना होनी चाहिए।

स्वयं धन्य होने के साथ दूसरों का जीवन भी धन्य बनाएं

मुनि श्री ने कहा कि स्वयं धन्य होने से आगे बढ़कर किसी दूसरे के जीवन को भी धन्य बनाइए। स्वयं निर्भय होने के साथ किसी दूसरे को निर्भय कीजिए। स्वयं भगवान से प्रभावित होने के साथ अपने जीवन से किसी दूसरे को भी प्रभावित कीजिए।

उन्होंने प्रेरणा दी कि जीवन ऐसा होना चाहिए कि उसे देखकर किसी दूसरे व्यक्ति के मन में भी भाव जागे—“काश! मेरा जीवन भी ऐसा होता।”

धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन रहे उपस्थित

प्रचार प्रमुख श्री संजय जी पाटोदी ने बताया कि धर्मसभा में चक्रवर्ती अध्यक्ष श्री नवीन जी गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष श्री आनंद जी गोधा, महोत्सव अध्यक्ष श्री अशोक जी डोशी, महामंत्री श्री हर्ष जी जैन, श्री प्रिंसपाल जी टोंग्या, संजय जी पाटोदी, श्री रमेश जी निर्वाणा, श्री सौरभ बड़जात्या, श्री रिटेश जी पाटनी, श्री योगेंद्र जी काला, श्री सौरभ जी पाटोदी एवं श्री भूपेंद्र जी भोपाली सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।

देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी का श्रवण कर आध्यात्मिक लाभ लिया।