सीकर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि मन वचन और काय में लोभ का संवरण के साथ संतोष होने पर शुचिता शौच उत्पन्न होती है। दशलक्षण पर्व के उत्तम शौच धर्म के दिन आचार्य श्री ने बताया कि पर्व धार्मिक पाठशाला है। जिसमें आप इन अनादि काल के अलौकिक पर्वों से आत्मानुशासन सीख सकते हैं। संयम से कभी कोई हारता नहीं हैं वाणी में सत्यता को लाकर कषायो को मंद करना चाहिए। कषाय से शरीर आत्मा की हानि होती है इनसे कभी लाभ नहीं होता ,इसीलिए मान को जहर की संज्ञा दी गई है। आचार्यश्री ने लोभ के अनेक प्रकार में जीवन का, आरोग्यता का, इन्द्रिय विषयों का, यश का, राज्य का, धन का, रूप रस आदि अनेक लोभ की विवेचना की।
आत्मा में विकृति अपवित्रता लोभ से आती है
डॉ राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि जीवन रक्षा और रसना लोलुपता के लोभ में सुभौम चक्रवती ने जीवन रक्षा के लिए णमोकार मंत्र को लात मारी। बीमारी में आप भक्ष्य और अभक्ष्य दवाईयों का ध्यान नहीं रखते। यश और राज्य के लोभ में कौरवों और पांडवों की कथा सब जानते हैं। चक्रवर्ती भी पर्वत पर किसी का नाम मिटाकर स्वयं का लिखता है। रूप और रस शब्द भोजन के लोभ में पतंगे, हिरण, मछली और भंवरा के प्राण चले जाते हैं। राज्य लोभ में कौरवों और पांडवों के युद्ध को सब जानते है। धन के लोभी सेठ जो स्वर्ण और जवाहरात के बैल की जोड़ी के लिए वर्षा में प्राणों को संकट में डालता है। अनेक उदाहरणों से बताया कि लोभ का संवरण कर संतोष ही शौच धर्म है। आत्मा में विकृति अपवित्रता लोभ से आती है। मन वचन और काय की पवित्रता से शुचिता उत्पन्न होती हैं। आकांक्षा और इच्छा सीमित करने से लोभ कम होता है। सभी को पर्वों के अतिरिक्त प्रतिदिन मंदिर में पूजन अभिषेक करने की प्रेरणा दी।
चार प्रकार के देवों के प्रकार बताए
आचार्य श्री के उपदेश के पूर्र्व आर्यिका श्री दिव्ययश मति माताजी ने पर्वों में महापर्व दशलक्षण पर्व को बताया। पर्व अनेक होते हैं। दशलक्षण पर्व आत्मा से संबंधित उनके गुणों की आराधना का पर्व है। आचार्य श्री धर्मसागर जी की गृहस्थ अवस्था के उदाहरण से बताया कि वह इतने संतोषी प्राणी थे कि व्यापार में एक रुपए का मुनाफा होने पर वह वापस व्यापार बंद करके आ जाते थे। एक सूत्र बताए कि जो प्राप्त है वह पर्याप्त है। इसी से सुचिता धर्म प्रकट होता है। आचार्य श्री के उपदेश के पूर्व पुण्यशाली परिवार द्वारा दीप प्रज्वलन कर आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। विधानाचार्य कीर्तिय के निर्देशन में पंचामृत अभिषेक के बाद मंडल विधान की पूजन प्रतिदिन चल रही है। आचार्य श्री द्वारा पूजन के मध्य पूजन के द्रव्यों को चढ़ाने से होने वाले पुण्य के बारे में बताया जाता है। दोपहर को तत्वार्थ सूत्र की विवेचना में चार प्रकार के देवों के प्रकार बताए। शाम को श्रीजी, मंडल विधान और आचार्य श्री की आरती के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।




