संत श्री हर्ष कीर्ति की सभी कृतियां राजस्थानी में: ये कविवर बनारसीदास के रहे समकालीन

राजस्थान के जैन संत व्यक्तित्व एवं कृतित्व के अंतर्गत राजस्थान के जैन संतों द्वारा लिखित हिन्दी साहित्य की खूब चर्चा होती है। इनकी रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। जितनी उस काल में रहीं, जब इनको लिखा गया। हिन्दी के साथ-साथ राजस्थानी भाषा को भी इन विद्वान संतों ने खूब पोषित किया। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 39वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का संत श्री हर्ष कीर्ति के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
इंदौर। राजस्थान के जैन संतों की श्रृंखला में संत श्री हर्षकीर्ति का नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है। हर्षकीर्ति 17वीं शताब्दी के कवि थे। राजस्थान इनका प्रमुख क्षेत्र रहा। राजस्थान के स्थान-स्थान पर विहार करके साहित्यिक एवं सांस्कृतिक जाग्रति उत्पन्न किया करते थे। हिन्दी के अच्छे विद्वान थे। अब तक इनकी चतुर्गति वेलि, नेमिनाथ राजुल गीत, नेमिश्वर गीत, मोरडा, कर्म हिंडोलना की भाषा, छहलेश्याकवित्त आदि कितनी ही रचनाएं उपलब्ध हो चुकी है। इन सभी कृतियां राजस्थानी में हैं। इनमें काव्यगत सभी गुण विद्यमान हैं। ये कविवर बनारसीदास के समकालीन थे। चतुर्गति वेलि को इन्होंने संवत 1683 में समाप्त किया था। कवि की कृतियां राजस्थान के शास्त्र भंडारों में अच्छी संख्या में मिलती हैं। जो इनकी लोकप्रियता का द्योतक है।
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