दिल्ली। ऋषभोदय में दिगम्बर जैन श्रमण-संस्कृति के उन्नायक पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा में जीवन के वास्तविक सुख, भक्ति, इन्द्रिय संयम और संतान को संस्कार देने के महत्व पर मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि बाहरी साधनों में वास्तविक सुख नहीं, बल्कि आत्मिक सुख ही सर्वश्रेष्ठ और शाश्वत सुख है।
आत्मिक सुख ही सर्वश्रेष्ठ
पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ सुख मानसिक एवं आत्मिक सुख है। आत्म-सुख शाश्वत और निरंतर रहने वाला है तथा इसके लिए बाहरी साधनों की आवश्यकता नहीं होती।
उन्होंने कहा कि यदि धन-संपत्ति और भौतिक साधनों में ही सुख होता तो संसार का प्रत्येक धनपति सुखी होता। भोगों में स्थायी शांति नहीं है, जबकि योग और साधना में शांति, सुख एवं शाश्वत आनंद का अनुभव होता है।
इन्द्रिय सुख क्षणिक और नश्वर
मुनिश्री ने कहा कि पांच इन्द्रियों के विषयों की लालसा में मनुष्य अनेक प्रकार के कष्टों को प्राप्त करता है। इन्द्रिय सुख क्षणिक, नश्वर और विनाशी हैं। वास्तव में ये सुख नहीं, बल्कि सुखाभास हैं।
उन्होंने कहा कि इन्द्रिय सुख प्राप्त करने के साधन जुटाने में श्रम, भोग के समय आसक्ति और वियोग के समय पीड़ा होती है। भोगों की चाह कभी समाप्त नहीं होती, बल्कि इच्छाएं और कामनाएं लगातार बढ़ती जाती हैं।
भक्ति से जीवन में आती है सुगंध
पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने गुरु भक्ति और प्रभु भक्ति का महत्व बताते हुए कहा कि जहां सच्चे गुरुओं के दिव्य उपदेश होते हैं, वहां कल्याण की इच्छा रखने वाले भव्य जीव स्वतः पहुंचते हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार पुष्पों की सुगंध से भौरे और मिश्री की सुगंध से चींटियां आकर्षित होती हैं, उसी प्रकार जहां जिनदेव और गुरु भगवंतों की भक्ति होती है, वहां भक्तिभाव से युक्त जीव स्वतः पहुंचते हैं।
संस्कार संतान के लिए सबसे बड़ा उपहार
पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि अच्छे संस्कार संतान के लिए उपहार के समान होते हैं। सु-संस्कार ही संतान को श्रेष्ठ, योग्य, विनयवान, विवेकी, यशस्वी, समृद्ध एवं सफल बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि माता-पिता यदि संतान का वास्तविक हित चाहते हैं तो उन्हें धन-संपत्ति के साथ संस्कारों का उपहार भी देना चाहिए। सु-संस्कारों से ही परिवार, समाज और संस्कृति की रक्षा संभव है।
संस्कारों से संस्कृति की रक्षा
उन्होंने कहा कि देश और विश्व को विनाश से बचाना है तो आने वाली पीढ़ी को संस्कारों से सुशोभित करना होगा। धर्म, सम्प्रदाय, पंथ और परंपराएं भिन्न हो सकती हैं, लेकिन नैतिक संस्कार सभी के लिए श्रेष्ठ और आवश्यक होने चाहिए।
उन्होंने जीवन में क्लेश से मुक्ति के लिए संक्लेश से मुक्त होने तथा संयमित एवं संस्कारित जीवन अपनाने की प्रेरणा दी।
गुरु-वाणी का संदेश
पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि भौतिक सुखों की अपेक्षा आत्मिक सुख को महत्व देना चाहिए। माता-पिता का सबसे बड़ा दायित्व केवल संतान के भविष्य के लिए धन जुटाना नहीं, बल्कि उसे ऐसा संस्कार देना है जिससे वह विवेक, विनय, संयम और नैतिकता के साथ जीवन जी सके।
देशनाचार्य : दिगम्बर जैन संत आचार्य विशुद्ध सागर
संकलन : मुनि सुव्रत सागर जी



