मुरैना। मध्यप्रदेश के मुरैना जिले की माटी में जन्मे आचार्य श्री 108 सुमतिसागर जी महाराज बीसवीं शताब्दी के प्रमुख दिगंबर जैन आचार्यों में गिने जाते हैं। कठोर तप, त्याग, संयम एवं आत्मसाधना के अद्भुत साधक आचार्यश्री शांत, गंभीर, सरल और तपस्वी व्यक्तित्व के धनी थे।
मासोपवास जैसी कठिन तप साधनाओं के कारण वे ‘मासोपवासी’ तथा समाधिपूर्वक देह त्याग के कारण ‘समाधिसम्राट’ के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किए जाते हैं। प्रकाशित स्मृति-ग्रंथ के अनुसार वे उत्तर भारत की शांतिसागर छाणी परंपरा के पंचम पट्टाचार्य थे।
जन्म एवं बाल्यकाल
आचार्यश्री सुमतिसागर जी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1974, आसोज शुक्ल चतुर्थी, 20 अक्टूबर 1917 को मध्यप्रदेश के वर्तमान मुरैना जिले के श्यामपुरा ग्राम में हुआ। उनका जन्मनाम नत्थीलाल जैन था। पिता श्री छिद्दूलाल जैन एवं माता श्रीमती चिरोंजाबाई जैन थीं। वे जैसवाल जैन समाज के भंडारी गोत्र से संबंधित थे।
धार्मिक संस्कारों से समृद्ध परिवार में पले नत्थीलाल जी का स्वभाव बाल्यकाल से ही शांत, गंभीर, सुशील और एकांतप्रिय था। उनके तीन भाई एवं एक बहन थीं। उनके छोटे भाई आगे चलकर आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज के रूप में प्रसिद्ध हुए।
गृहस्थ जीवन से वैराग्य की ओर
लगभग 12 वर्ष की आयु में उनका विवाह मुरैना जिले के खबरोली निवासी श्री रामचंद्र जी की सुपुत्री श्रीमती रामश्री देवी से हुआ। विवाह के पश्चात वे मुरैना में रहने लगे और कुछ समय खाद्यान्न व्यापार से जुड़े रहे।
गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उनका मन धीरे-धीरे धर्म, स्वाध्याय और वैराग्य की ओर उन्मुख होता गया। आचार्य श्री 108 विमलसागर जी महाराज के मुरैना आगमन और उनके आहारदान का अवसर नत्थीलाल जी के जीवन का निर्णायक मोड़ बना। आचार्यश्री के तप, त्याग और संयम से प्रभावित होकर उनके भीतर वैराग्य की भावना प्रबल होती गई।
ऐलक और मुनि दीक्षा
विक्रम संवत 2025 की चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, वर्ष 1968 में उन्होंने आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज से ऐलक दीक्षा ग्रहण की और ऐलक श्री वीरसागर जी महाराज नाम प्राप्त किया।
ऐलक अवस्था में कठोर संयम, स्वाध्याय और तपस्या में प्रवृत्त रहने के पश्चात उन्होंने गाजियाबाद में वर्ष 1968 में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की। मुनि दीक्षा के बाद उनका नाम मुनि श्री 108 सुमतिसागर जी महाराज हुआ।
मुनि जीवन में वे अध्ययन, ध्यान, तप और आत्मचिंतन में निरंतर प्रवृत्त रहे। देश के विभिन्न भागों में विहार कर उन्होंने जैन धर्म, अहिंसा, अनेकांत, संयम एवं आत्मकल्याण का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।
आचार्य पद और धर्मप्रभावना
उपलब्ध संदर्भों के अनुसार 13 अप्रैल 1973 को मुरैना में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज ने उन्हें आचार्य पद प्रदान किया। आचार्य पद ग्रहण करने के बाद उन्होंने शांतिसागर छाणी परंपरा की साधना, तप और धर्मप्रभावना को आगे बढ़ाया।
उनके सान्निध्य में अनेक पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं, वेदी प्रतिष्ठाएं एवं धार्मिक आयोजन संपन्न हुए। उन्होंने अनेक जिनालयों और धार्मिक गतिविधियों के लिए प्रेरणा दी तथा साधु-साध्वियों एवं श्रावकों को संयम, स्वाध्याय, विनय, अनुशासन और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
कठोर तपस्या से मिला ‘मासोपवासी’ संबोधन
आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज की साधना का विशिष्ट पक्ष उनकी कठोर तपस्या थी। लंबे उपवासों और मासोपवास जैसी कठिन साधनाओं के कारण श्रद्धालु उन्हें प्रेम एवं श्रद्धा से ‘मासोपवासी’ कहकर स्मरण करते थे।
उनकी साधना का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने की दिशा में पुरुषार्थ करना था। उनके जीवनवृत्त में लगभग 50 व्यक्तियों को दीक्षा देकर उन्हें संयम मार्ग पर अग्रसर करने का उल्लेख मिलता है। उनके प्रमुख शिष्यों में विद्याभूषण सन्मति सागर महाराज, सराकोद्धारक ज्ञानसागर महाराज एवं ज्ञेयसागर महाराज का नाम उल्लेखनीय है।
सोनागिरि में समाधिमरण
जीवन के अंतिम समय में भी आचार्यश्री अपनी साधना के प्रति पूर्ण सजग रहे। जीवनवृत्त में उन्हें समाधि समय का पूर्वाभास होने और साधु-संघ को संकेत देने का उल्लेख मिलता है।
3 अक्टूबर 1994 को मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र सोनागिरि में प्रातः लगभग 9:30 बजे उन्होंने नश्वर शरीर का त्याग कर समाधिमरण प्राप्त किया। लगभग 77 वर्ष के जीवन में उन्होंने गृहस्थ से साधु और साधु से आचार्य बनने तक की आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण की।
समाधि दिवस पर आचार्यश्री का जीवन तप, त्याग, संयम, आत्मानुशासन और धर्मप्रभावना की उस उज्ज्वल परंपरा को स्मरण कराता है, जो आज भी जैन समाज को आत्मकल्याण के मार्ग पर प्रेरित करती है।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





