इंदौर। नेमी नगर जैन कॉलोनी के घुंघट गार्डन में चल रहे चातुर्मास के दौरान नित्य प्रवचन का दौर जारी है। इसका धर्मप्रेमी समाजजन पुण्य लाभ ले रहे हैं। आचार्य श्री सुनीलसागरजी ने धर्मसभा में रूप चौदस के अवसर पर अपने प्रवचन में पर्व के वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ को समझाते हुए कहा कि रूप को निहारोगे तो बिखर जाओगे क्योंकि, हर बाहरी रूप एक दिन बिखर जाता है लेकिन, स्वरूप को निहारोगे तो निखर जाओगे। उन्होंने कहा कि रूप चौदस केवल बाहरी सौंदर्य और श्रृंगार का पर्व नहीं है बल्कि, अपने निज स्वरूप को पहचानने और आत्मा को विकारों से मुक्त करने का अवसर है।

चेतन! निज रूप निहारो,चेतन स्वरूप को निखारो

आचार्य श्री ने भगवान महावीर स्वामी के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि इस दिन भगवान महावीर ने घातिया कर्मों से ऊपर उठकर अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को निहारने का पुरुषार्थ किया था। आज लोग रूप चौदस को शृंगार और सौंदर्य से जोड़कर मनाते हैं। धनतेरस पर खरीदे गए सोने के आभूषण पहनकर घूमना ही इस पर्व का उद्देश्य नहीं है, बल्कि वास्तविक रूप चौदस तो अपने भीतर के चेतन स्वरूप को निहारना और उसे निखारना है। उन्होंने प्रेरित करते हुए कहा कि "चेतन! निज रूप निहारो, अपने चेतन स्वरूप को निखारो।"

गरीब के चेहरे पर मुस्कान लाकर देखिए

दीपावली के संदर्भ में गुरुदेव ने सामाजिक सरोकारों को जोड़ते हुए मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों की आजीविका की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक रोशनी के साधनों के कारण कहीं न कहीं कुम्हारों के घर का उजाला प्रभावित हुआ है। इस बार दीपावली पर अपने घर को रोशन करने के साथ सड़क किनारे बैठे गरीब कुम्हारों से भी कुछ दीपक अवश्य खरीदें ताकि, किसी जरूरतमंद की दीपावली भी यादगार बन सके। किसी गरीब के चेहरे पर मुस्कान लाकर देखिए, दीपावली मनाने का आनंद और भी बढ़ जाएगा।

पटाखे जलाने से स्वयं भी फटफटाओगे

गुरुदेव ने पटाखों के स्थान पर आंतरिक विकारों को जलाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि पटाखे जलाने से स्वयं भी फटफटाओगे लेकिन, यदि एक दिन अपने भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों को जला दिया, तो जीवन में महावीरत्व की दिशा में आगे बढ़ सकोगे। अंत में उन्होंने प्रेरक संदेश देते हुए कहा कि "Diwali की Light करें सबको Delight, पकड़ो मस्ती की Flight और Enjoy करो धर्म-ध्यान Day and Night." उन्होंने सभी को दीपावली का पर्व खुशियों, करुणा, आत्मचिंतन और धर्मध्यान के साथ मनाने की प्रेरणा दी।