धरियावद। भक्तामर विधान के 24वें दिन 48 अर्घ्य अर्पित कर छह पुण्याजक परिवारों ने सपरिवार इंद्र-इंद्राणी बनकर अन्य श्रावक-श्राविकाओं के साथ भक्तिभावपूर्वक विधान पूजन किया। प्रवचन में आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज ने भगवान की महिमा बताते हुए कहा कि भगवान अविनाशी और अनादि हैं। जैन दर्शन के अनुसार यह सृष्टि अनादि-अनंत है और छह द्रव्यों—जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल से बनी है।
इनमें निरंतर परिवर्तन होता है लेकिन, इनका कभी विनाश नहीं होता। आचार्यश्री ने कहा कि संसार में दो ही खाते हैं-पुण्य और पाप। मनुष्य को निरंतर पुण्य का संचय करना चाहिए, क्योंकि पुण्य साथ हो तो संसार भी सम्मान देता है, जबकि विपत्ति में कोई साथ नहीं देता। अतः जीवन में पुण्य अर्जित करते हुए मोक्षमार्ग को प्रशस्त करना चाहिए।



