सीकर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी पारस भवन दंग की नसिया में संघ सहित विराजित हैं। 16 कारण पर्व प्रारंभ हो चुके हैं। दर्शन विशुद्धि भावना की विवेचना में आचार्य वर्धमान सागर जी ने आचार्य धर्मसागर सभागृह में बताया कि एकादशी के पहले 16 कारण पर्व प्रारंभ हो चुके हैं। दर्शन विशुद्धि भावना के अंतर्गत दर्शन का आशय देखना होता है किंतु दर्शन श्रद्धा रूपी नेत्र से आत्मा में स्थित देव के करना चाहिए। दर्शन करने से विशुद्धि बढ़ जाए उसे दर्शनविशुद्धि भावना कहते हैं। संसार के आवागमन से छूटने के लिए भव्य प्राणी संयम दीक्षा धारण कर धर्म के सहारे पुरुषार्थ कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। 16 कारण भावना को जीवन में अपनाना चाहिए। डॉ. राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा है कि सम्यक कृति अर्थात संस्कृति, भले प्रकार से किया गया कार्य संस्कृति है संस्कृति जीवन का आधार है। संस्कृति अपना कर जीवन में परिवर्तन लाने पर ही आध्यात्मिक पर्व मनाना सार्थक होगा।
मोह से आत्मा थकी हुई है, कषाय आत्मा की शत्रु है
आचार्यश्री ने कहा कि संस्कृति संस्कार धर्म से जीवन का निर्माण होता है ,यही जीवन का सार आधार है। सम्यकदर्शन जीवन में अपने से जीवन में मिथ्यात्व मोह रूपी अज्ञान अंधकार दूर होता है मिथ्यात्व और मोह से आत्मा थकी हुई है कषाय आत्मा की शत्रु है, दिशा बदलने से दशा बदलती है। सच्चे देव शास्त्र गुरु की उपासना श्रद्धा भक्ति से कर गुरु के उपदेश सुनकर जीवन में परिवर्तन करें जिस प्रकार बांध बनाने से पानी ऊपर उठना है।
खानपान व वेशभूषा से जीवन में परिवर्तन करें
आचार्यश्री ने कहा कि उसी प्रकार जीवन में संयम धारण करने ,तप करने, धर्म रूपी बांध बनाने से जीवन भी संस्कारित होकर और ऊंचा उठता है। भगवान के दर्शन सम्यकदर्शन का आधार है। सभी को आचार विचार ,खानपान व वेशभूषा से जीवन में परिवर्तन करना चाहिए। वर्तमान की यश नाम कीर्ति नश्वर है। अक्षय कीर्ति 16 कारण भावना से मिलती है। तीर्थंकरों ने भी अक्षय कीर्ति जन साधारण के कल्याण की भावना करने भाने से प्राप्त की है।



