चन्देरी। आज संसार पहले की अपेक्षा कहीं अधिक निकट दिखाई देता है। दूरियां मिट गई हैं, संवाद के साधन बढ़ गए हैं और विज्ञान ने पृथ्वी को मानो एक छोटे से गांव में बदल दिया है। लेकिन भीतर झांकने पर एक विडंबना दिखाई देती है—साधन बढ़े हैं, किन्तु संबंध घटे हैं; परिचय बढ़े हैं, लेकिन आत्मीयता कम हुई है। मित्रों की सूची लंबी हुई है, मगर सच्चे मित्र दुर्लभ हो गए हैं। ऐसे समय में मित्रता दिवस केवल शुभकामनाएं देने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन के सबसे अमूल्य संबंध पर विचार करने का दिन है।

विश्वास की नींव पर खड़ी होती है मित्रता

मनुष्य परिवार में पलता है, समाज में बढ़ता है और जीवन के सफर में अनेक लोगों से मिलता है। इन सबके बीच जो संबंध बिना किसी बंधन, अधिकार या स्वार्थ के बनता है, वही मित्रता है। इसमें न कोई अनुबंध होता है और न कोई शर्त। यह केवल विश्वास की नींव पर टिकी होती है। जिस दिन विश्वास टूटता है, उसी दिन मित्रता का आधार भी कमजोर पड़ने लगता है।

सुख में साथ और दुख में सहारा

सच्चा मित्र वह नहीं जो केवल हमारे सुख में मुस्कराए। ऐसे लोग तो मेले की भीड़ की तरह होते हैं, जो प्रकाश देखकर एकत्रित होते हैं और अंधेरा होते ही बिखर जाते हैं। सच्चा मित्र वह है जो कठिन समय में हमारे आंसू पोंछने के लिए आगे बढ़े, असफलता में साहस बने और सफलता में हमें अहंकार से बचाए। जीवन की कठिन परिस्थितियों में जो हाथ कंधे पर आकर टिक जाए, वही मित्रता का वास्तविक परिचय है।

स्वार्थ नहीं, त्याग है मित्रता का आधार

आज समाज में संबंधों को भी लाभ-हानि के तराजू पर तौलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जहां लाभ दिखाई देता है, वहां मित्रता बन जाती है और जहां स्वार्थ समाप्त होता है, वहां संबंध भी खत्म हो जाता है। ऐसी मित्रता व्यापार हो सकती है, आत्मीयता नहीं। व्यापार में लाभ देखा जाता है, जबकि मित्रता में त्याग और विश्वास को महत्व दिया जाता है।

इतिहास में मित्रता के आदर्श

इतिहास साक्षी है कि सच्ची मित्रता निभाने वाले लोगों ने अपने जीवन को महान बनाया। किसी ने मित्र के लिए राज्य छोड़ा, किसी ने प्राणों की बाजी लगाई और किसी ने अपने सुख का त्याग कर मित्र का दुःख अपना लिया। इन प्रसंगों का महत्व इसलिए है कि वे मनुष्य को बताते हैं कि प्रेम और विश्वास से बढ़कर कोई संपत्ति नहीं होती।

कठिन समय में होती है मित्रता की परीक्षा

आज का युवा कई बार मित्रता को मनोरंजन का साधन समझ लेता है। साथ घूमना, चित्र खिंचवाना और संदेशों का आदान-प्रदान करना ही मित्रता नहीं है। मित्रता की असली परीक्षा तब होती है, जब जीवन कठिन प्रश्न सामने रखता है। निराशा, असफलता और विपरीत परिस्थितियों में जो व्यक्ति साथ खड़ा रहता है, वही सच्चा मित्र है।

अहंकार मित्रता का सबसे बड़ा शत्रु

मित्रता का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। जहां ‘मैं’ बड़ा हो जाता है, वहां ‘हम’ छोटा पड़ जाता है। मित्रता में अधिकार नहीं, अपनापन होता है; आदेश नहीं, परामर्श होता है; संदेह नहीं, विश्वास होता है। छोटी-छोटी बातों पर क्रोध, क्षमा का अभाव और केवल अपनी बात को सही मानना मजबूत रिश्तों को भी कमजोर कर देता है।

परिवार में भी जरूरी है मित्रता का भाव

परिवार में भी मित्रता का भाव आवश्यक है। माता-पिता यदि बच्चों के मित्र बन जाएं तो पीढ़ियों के बीच की दूरी कम हो सकती है। पति-पत्नी यदि रिश्ते के साथ मित्रता से भी जुड़े रहें तो घर में विश्वास और प्रसन्नता का वातावरण बनता है। गुरु यदि शिष्य का हितैषी मित्र बन जाए तो शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन बन जाती है।

डिजिटल युग में आत्मीयता की चुनौती

डिजिटल युग ने संवाद को सरल बनाया है, लेकिन संवेदना को कठिन भी कर दिया है। हजारों संपर्क होने के बावजूद मनुष्य अकेलापन अनुभव करता है। स्क्रीन पर दिखाई देने वाले सभी चेहरे मित्र नहीं होते। मित्र वह है जिसकी उपस्थिति मन को शांति दे, जिसकी बातों में विश्वास हो और जिसकी नीयत में छल का स्थान न हो।

पहले स्वयं बनें सच्चे मित्र

सच्ची मित्रता पाने से पहले स्वयं सच्चा मित्र बनना पड़ता है। जो स्वयं विश्वास नहीं करता, वह विश्वास प्राप्त नहीं कर सकता। जो दूसरों के सुख-दुःख में सहभागी नहीं बनता, उसके जीवन में भी आत्मीयता का प्रकाश नहीं उतरता। संसार में अच्छे मित्रों की कमी नहीं, आवश्यकता अच्छे मित्र बनने वालों की है।

मित्रता दिवस का वास्तविक संदेश

मित्रता दिवस का अर्थ केवल रंगीन बंधन बांधना या औपचारिक शुभकामनाएं भेजना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ पुराने मनमुटाव मिटाना, रूठे मित्र को मनाना, किसी अकेले व्यक्ति का हाथ थामना और संबंधों को स्वार्थ नहीं, विश्वास से सींचने का संकल्प लेना है। जिस समाज में मित्रता जीवित रहती है, वहां वैमनस्य कम होता है, सहयोग बढ़ता है और मनुष्यता सुरक्षित रहती है।

संबंध ही जीवन की वास्तविक पूंजी

मनुष्य अपने पीछे धन, भवन और वैभव नहीं छोड़ता। वह छोड़ता है अपना व्यवहार, अपनी स्मृतियां और अपने संबंध। यदि किसी व्यक्ति के जाने के बाद उसके मित्र उसकी सरलता, निष्ठा और आत्मीयता को याद करें तो समझना चाहिए कि उसका जीवन सफल रहा। यही वह संपत्ति है जिसे कोई चोर नहीं चुरा सकता, समय नष्ट नहीं कर सकता और विपत्ति छीन नहीं सकती।

मित्रता का दीपक सदैव जलाए रखें

मित्रता दिवस पर हमें ऐसा संकल्प लेना चाहिए जो केवल एक दिन तक सीमित न रहे। हम ऐसे मित्र बनें जिनकी उपस्थिति से किसी का साहस बढ़े, शब्दों से किसी का दुःख हल्का हो और व्यवहार से मानवता का विश्वास मजबूत हो। मनुष्य की पहचान केवल पद, प्रतिष्ठा या संपत्ति से नहीं, बल्कि मित्रों के हृदय में बसे उसके स्थान से होती है।

मित्रता का दीपक यदि हृदय में जलता रहे तो जीवन की सबसे अंधेरी राह भी उजाले में बदल जाती है।

लेखक : डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’