मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में जैनाचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में अधिकांश लोग धन को ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मान बैठे हैं। धन कमाने की अंधी दौड़ में मनुष्य अपने नैतिक मूल्यों, आत्मकल्याण और धर्म से दूर होता जा रहा है। जबकि धन नश्वर, चंचल और परिवर्तनशील है। आज है तो कल नहीं भी हो सकता, लेकिन धर्म ऐसा अमूल्य धन है, जो इस जन्म के साथ-साथ अनंत जन्मों तक जीव के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

धन साधन है, जीवन का उद्देश्य नहीं

आचार्यश्री ने कहा कि धन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन हो सकता है, लेकिन जीवन का उद्देश्य कभी नहीं बन सकता। धर्म ही मनुष्य के जीवन को दिशा, शांति, संयम और आत्मिक सुख प्रदान करता है। धर्म के प्रभाव से जीव के संचित पापकर्मों का क्षय होता है, पुण्य का अर्जन होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। धर्म वर्तमान जीवन के साथ-साथ परभव को भी उज्ज्वल और मंगलमय बनाता है।

निर्मल भाव से हो धर्म की साधना

उन्होंने कहा कि धर्म के प्रति श्रद्धा, भक्ति और विश्वास अटूट होना चाहिए। परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए। धर्म की साधना दिखावे, आडंबर या स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि निर्मल भाव, पूर्ण आस्था और निष्कपट मन से करनी चाहिए। जिस धर्म में छल, कपट, धोखाधड़ी या अहंकार का प्रवेश हो जाता है, उसका वास्तविक स्वरूप प्रभावित होता है। इसलिए धर्म का पालन पूर्ण ईमानदारी और आत्मशुद्धि के भाव से करना आवश्यक है।

धन के साथ धर्म को दें सर्वोच्च स्थान

आचार्यश्री ने कहा कि आज आवश्यकता है कि हम धन के साथ-साथ धर्म को भी अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान दें। धन केवल सांसारिक सुविधाएं दे सकता है, लेकिन धर्म आत्मिक शांति, सच्चा आनंद और शाश्वत सुख प्रदान करता है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय धर्म, स्वाध्याय, पूजा, ध्यान, संयम और आत्मचिंतन के लिए अवश्य निकालना चाहिए।

धर्मसभा के समापन पर आचार्यश्री ने कहा, “धन कुछ तो है, लेकिन सब कुछ नहीं है। धर्म ही मनुष्य का वास्तविक धन है। इसलिए हे भव्य आत्माओं! हमें धन की नहीं, धर्म की आवश्यकता है। धर्म ही जीवन का आधार, आत्मा का श्रृंगार और मोक्ष का द्वार है।”

चिंतन और ध्यान से निर्मित होता है जीवन

मुनिश्री 108 उपशांत सागर महाराज ने धर्मसभा में ध्यान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन उसके चिंतन और ध्यान की दिशा से निर्मित होता है। जैन दर्शन में ध्यान के चार भेद बताए गए हैं—आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान एवं शुक्ल ध्यान। इन चारों ध्यानों का प्रभाव जीव के वर्तमान और भविष्य, दोनों पर पड़ता है।

धर्म ध्यान आत्मशुद्धि का माध्यम

मुनिश्री ने कहा कि धर्म ध्यान आत्मा की शुद्धि का माध्यम है। आत्मचिंतन, आत्मावलोकन, जिनवाणी का मनन, गुरु के प्रति समर्पण, धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा तथा शुभ और पवित्र भावों का निरंतर चिंतन ही धर्म ध्यान की दिशा है। धर्म ध्यान से आत्मा निर्मल होती है, पापकर्मों का क्षय होता है, पुण्य का संचय होता है तथा जीव आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता है।

आर्त और रौद्र ध्यान का करें त्याग

मुनिश्री ने कहा कि आज मनुष्य धन, वैभव और भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहा है, जबकि वास्तविक आवश्यकता धर्म और आत्मकल्याण की है। यदि जीवन को सफल, शांत और सार्थक बनाना है तो प्रत्येक क्षण को धर्ममय बनाना होगा। आर्त और रौद्र ध्यान का त्याग कर धर्म ध्यान एवं शुक्ल ध्यान की दिशा में निरंतर साधना करना आत्मोन्नति, मानव जीवन की सार्थकता और मोक्षमार्ग का सच्चा आधार है।

श्रद्धा और एकाग्रता से सुने प्रवचन

धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री उदारसागर महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज के ओजस्वी, तत्त्वज्ञानपूर्ण एवं जीवनोपयोगी प्रवचनों को अत्यंत श्रद्धा और एकाग्रता के साथ श्रवण किया। प्रवचनों से प्रेरित होकर अनेक श्रद्धालुओं ने धर्म, संयम, स्वाध्याय एवं आत्मचिंतन को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाने का संकल्प लिया।

धर्मसभा के प्रारंभ में समाज के श्रावक श्रेष्ठियों एवं गणमान्य बंधुओं द्वारा मंगलाचरण, चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया।