दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत शनिवार को उत्तम शौच धर्म का दिवस श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। प्रातः श्री महावीर मंदिर में भगवान का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके बाद पुण्यसागर सभागार में नित्य-नियम पूजन, पर्व पूजन के साथ जंबूद्वीप महामंडल विधान की पूजा-अर्चना और आराधना हुई।
लोभ को बताया पाप की जड़
धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज ने उत्तम शौच धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि लोभ को पाप का बाप कहा गया है। मनुष्य जितना अधिक इच्छाओं और लोभ के जाल में उलझता है, उतना ही अशांति की ओर बढ़ता है। इसके विपरीत संतोष व्यक्ति को सुख और शांति की अनुभूति कराता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को लोभ का त्याग कर संतोष को जीवन में स्थान देने की प्रेरणा दी।
केवल शरीर की स्वच्छता नहीं है शौच धर्म
आचार्यश्री ने कहा कि उत्तम शौच केवल शरीर की बाहरी स्वच्छता का नाम नहीं है। व्यक्ति कितनी भी बार स्नान कर ले, लेकिन यदि मन के भीतर लोभ, मोह, कपट और विकार मौजूद हैं तो केवल बाहरी स्वच्छता से आत्मिक निर्मलता प्राप्त नहीं होती।
उन्होंने कहा कि शरीर का मैल धोना सरल है, लेकिन मन के भीतर जमा विकारों को दूर करना वास्तविक साधना है।
भावों की निर्मलता ही सच्ची साधना
आचार्य कल्प पुण्यसागर जी ने कहा कि शील, जप, तप, ज्ञान और ध्यान के माध्यम से आत्मा को निर्मल बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए। उत्तम शौच व्यक्ति को अपने विचारों, भावों और आचरण की ओर देखने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि लोभ का त्याग, संतोष का स्वीकार और आत्मभावों की निर्मलता ही उत्तम शौच धर्म का सार है।
जंबूद्वीप महामंडल विधान में उमड़ी श्रद्धा
पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा के बाद पुण्यसागर सभागार में श्रद्धालुओं ने नित्य-नियम पूजन और पर्व पूजन किया। इसके साथ जंबूद्वीप महामंडल विधान की आराधना में श्रावक-श्राविकाओं ने भक्तिभाव से सहभागिता की।
दशलक्षण महापर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं ने बाहरी आडंबर से हटकर आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और संतोष की भावना को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।




