ललितपुर । पूरी दुनिया में ‘जगत पूज्य’ के रूप में प्रतिष्ठित निर्यापक मुनि श्री 108 सुधासागर महाराज के ओजस्वी विचार केवल कानों तक सीमित नहीं रहते, वे सीधे मन के भीतर उतरकर ऊर्जा, जागृति और जीवन को नई दिशा देने का भाव जगाते हैं।
धर्म के मर्म को समझाने की उनकी शैली अत्यंत प्रभावी है। उनके शब्दों में बनावटी प्रेरणा नहीं, बल्कि अनुभव, शास्त्र, तथ्य और जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश दिखाई देता है। उन्हें सुनते हुए लगता है कि वे केवल संत नहीं, जीवन को सही दिशा देने वाले आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं।
धर्म हमारे भीतर ही है
जब गुरुश्रेष्ठ दस धर्मों की व्याख्या करते हैं और उदाहरणों के माध्यम से उनका मर्म समझाते हैं, तब अनुभूति होती है कि धर्म बाहर कहीं खोजने की वस्तु नहीं है। धर्म तो हमारे भीतर ही विद्यमान है, आवश्यकता केवल उसे व्यवहार में उतारने के ईमानदार प्रयास की है।
दलाल बाग में श्रावक संस्कार शिविर के दौरान मुनिश्री के मंगल प्रवचन सुनते हुए ज्ञान की अद्भुत महिमा का अनुभव होता है। न कोई लिखित नोट, न कागज की आवश्यकता और न ही विषय को याद रखने का प्रयास—विषय प्रारंभ होते ही ज्ञान की गंगा प्रवाहित होने लगती है। हम सुनते जाते हैं और भीतर कुछ बदलता जाता है।
दस धर्मों से आत्मपरिवर्तन
उत्तम क्षमा सुनते-सुनते क्षमा धारण करने का भाव जगता है।
उत्तम मार्दव सुनते-सुनते अहंकार छोटा लगने लगता है।
उत्तम आर्जव सुनते-सुनते मन की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों को सीधा करने की इच्छा होती है।
उत्तम शौच सुनते-सुनते भीतर की निर्मलता की आवश्यकता समझ में आती है।
उत्तम सत्य सुनते-सुनते सत्य को जीवन का आभूषण बनाने का भाव जागता है।
और उत्तम संयम तक पहुंचते-पहुंचते अनुभव होता है कि जीवन की असली दिशा अपने आप पर विजय पाना है।
यही गुरु की महिमा है। गुरु केवल बोलता नहीं, वह हमारे भीतर सोए हुए धर्म को जगा देता है।
गुरु की सच्ची प्रशंसा
किसी महान व्यक्तित्व की महिमा शब्दों में बांधना सरल नहीं होता। गुरु की सच्ची प्रशंसा उनके गुणों की केवल गिनती करना नहीं, बल्कि उनके ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना है। उनकी तस्वीर को केवल घर की दीवार पर नहीं, अपने हृदय में स्थापित करना है।
इसीलिए असंख्य लोगों के हृदय में जगत पूज्य विराजमान हैं। किसी के लिए वे गुरु हैं, किसी के लिए मार्गदर्शक, किसी के लिए संस्कारों के निर्माता और किसी के लिए जीवन की दिशा बदल देने वाले महान व्यक्तित्व।
संयम स्वयं को साधने की साधना
उत्तम संयम धर्म का दिन हमें स्मरण कराता है कि संयम कोई सामान्य संकल्प नहीं, बल्कि स्वयं को साधने की साधना है। इस मार्ग पर एक योग्य गुरु का मिलना जीवन का बड़ा सौभाग्य है।
आज केवल संयम लेने का ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में गुरु के विचारों, संस्कारों और सिद्धांतों के प्रति समर्पित होने का दिन है। गुरुश्रेष्ठ के ज्ञान का प्रकाश सामने हो तो जीवन को बदलने के लिए रास्ता कहीं दूर खोजने की आवश्यकता नहीं रहती।
पुण्य केवल पूजा में नहीं, जीवन को बेहतर बनाने के ईमानदार प्रयास में भी है।
गुरु मिले तो ज्ञान मिले,
ज्ञान मिले तो विवेक मिले,
विवेक मिले तो संयम मिले,
और संयम मिले तो जीवन सार्थक हो जाए।
पोस्टर सार:
उत्तम संयम स्वयं को साधने की साधना है।
गुरु का ज्ञान भीतर सोए हुए धर्म को जगा देता है।
गुरु मिले तो ज्ञान, विवेक और संयम से जीवन सार्थक हो जाता है।
श्रीफल साथी राजीव सिंघई




