सीकर। आचार्य श्रीवर्धमान सागर जी महाराज संघ सहित दंग की नसिया में विराजित हैं। आचार्य श्री संघ के तीन साधुओं मुनि श्री प्रभाष सागर जी, आर्यिका श्री जिनेश मति, आर्यिका श्री सुदृष्टि मति की संयम संलेखना समाधि चल रही है। जिसे देखने के लिए काफी संख्या में अनेक नगरों से समाज जन पधार रहे हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेन्द्र सागर जी सहित संघ के मुनियों आर्यिका माताजी द्वारा प्रतिदिन क्षपक साधुओं को संबोधित किया जाता है। इसी क्रम में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में बताया कि देव शास्त्र गुरु के प्रति हमारा अनुराग होना जरूरी है। सच्चे सुख की ललक हमारे भीतर होना चाहिए। वर्तमान में तीन साधुओं की समाधियों की साधना चल रही है। साधु मोक्ष रूपी साध्य की सिद्धि के लिए लक्ष्य बनाकर गुरु के माध्यम से तप साधना कर्मों की निर्जरा कर रहे हैं। साधु सभी को व्रत नियम की प्रेरणा देते हैं।

संलेखना समाधि खुशी-खुशी की जाती है

डॉ राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि प्रभाष सागर जी ने अपने आराध्य आचार्य धर्म सागर जी की समाधि को अपना माना। दीक्षा के पूर्व 36 वर्षों से लगातार वह गुरु की समाधि पर आकर यही भावना करते थे कि मुझे भी समाधि आपके ही समाधि स्थल पर लेनी है। उन्होंने कई वर्षों से यह भावना कर रखी थी कि मुझे दीक्षा लेकर ’समाधि’ करना है। उनके पुण्य का संयोग रहा कि संघ का सीकर चातुर्मास करना हुआ और उन्हें लक्ष्य दीक्षा की प्राप्ति हो गई हैं। संलेखना समाधि और आत्महत्या में बहुत अंतर है। आत्महत्या दुखी होकर की जाती है। संलेखना समाधि खुशी-खुशी की जाती है। इसीलिए साधुओं की समाधि का महामृत्यु महोत्सव होता है।

स्वाध्याय में भी स्थिर बैठते थे

समाधि साधना परिणाम भावों को निर्मल रखकर, हर समय सजग रह कर की जाती है। आचार्य श्री ने कुंडलपुर में मुनि श्री सौम्य सागर जी की समाधि के बारे में बताया कि लगातार उपवास करने के बावजूद पर स्वाध्याय में भी स्थिर बैठते थे। उनकी साधना देखकर लोगों को आश्चर्य होता था। पुण्यार्जक परिवार द्वारा आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। इसके पूर्व मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी का उपदेश हुआ।