भारतीय संस्कृति का प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का सजीव अध्याय है। चैत्र शुक्ल एकम—जिसे देश के विभिन्न अंचलों में गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। आगरा से पढ़िए, डॉ. राजीव जैन की यह खबर...
आगरा। भारतीय संस्कृति का प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का सजीव अध्याय है। चैत्र शुक्ल एकम—जिसे देश के विभिन्न अंचलों में गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। ऐसा ही एक पावन दिवस है, जो नववर्ष के साथ-साथ नवचेतना, नवसंस्कार और नवसंकल्प का संदेश लेकर आता है। यह वह शुभ घड़ी है, जब प्रकृति स्वयं नवजीवन का आह्वान करती है—वृक्षों पर नवपल्लव, वातावरण में नवसुगंध और चेतना में नवप्रेरणा का संचार होता है। मानो संपूर्ण सृष्टि एक नए अध्याय के आरंभ का उत्सव मना रही हो। जैन दर्शन की दृष्टि से यह दिवस और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो उठता है, क्योंकि यह हमें प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) की स्मृति और उनके द्वारा प्रदत्त दिव्य जीवन-दर्शन की ओर ले जाता है। जब कल्पवृक्षों का युग समाप्ति की ओर अग्रसर हुआ और मानव जीवन सहजता से संघर्ष की ओर बढ़ा, तब समाज दिशाहीनता के अंधकार में डूबने लगा। ऐसी विषम परिस्थिति में भगवान आदिनाथ ने केवल एक अवतार नहीं लिया, बल्कि मानव सभ्यता को एक नई दिशा दी। उन्होंने जीवन को साधना और व्यवस्था का स्वरूप दिया।