कुण्डलपुर। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में चातुर्मासीय धर्माराधना का वातावरण निरंतर भक्तिमय और आध्यात्मिक होता जा रहा है। प्रतिदिन प्रातः 7:30 बजे से बड़े बाबा श्री आदिनाथ भगवान के चरणों में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज एवं मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज ससंघ (10 पिच्छी) के सान्निध्य में भव्य अभिषेक श्रद्धा, भक्ति और मंत्रोच्चार के साथ किया जा रहा है। देश के विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालु बड़े बाबा के चरणों में अभिषेक कर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।

मन की अशांति जिनवाणी से होती है दूर

अभिषेक से पूर्व आयोजित धर्मसभा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने जीवन को भीतर से पवित्र और संस्कारित बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संसार में जल शरीर की गर्मी को शांत कर सकता ह, लेकिन मन की अशांति, तनाव, संताप और विकारों को समाप्त करने की शक्ति जिनवाणी और गुरुवाणी में है। उन्होंने कहा कि तीर्थक्षेत्र आने का उद्देश्य केवल भगवान का अभिषेक करना नहीं, बल्कि जिनवाणी के अमृत का पान कर अंतर्मन को निर्मल बनाना भी होना चाहिए। जब तक मन शुद्ध नहीं होगा, तब तक बाहरी पूजा की पूर्ण सार्थकता नहीं हो सकती।

भगवान के अभिषेक के साथ अंतर्मन का भी अभिषेक

मुनिश्री ने कहा कि भगवान की प्रतिमा का अभिषेक वास्तव में अपने अंतःकरण के अभिषेक का माध्यम है। जिस प्रकार जल भगवान के चरणों का स्पर्श करता है, उसी प्रकार श्रद्धा, विनय और समर्पण हमारे हृदय को स्पर्श करें, तभी अभिषेक सार्थक है। केवल हाथों से पूजा कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन को भी वीतरागता की दिशा में अग्रसर करना आवश्यक है।

निर्मल भावों से धर्मसाधना का फल

मुनिश्री ने कहा कि जो श्रद्धालु निर्मल भावों, निष्कपट श्रद्धा और सम्यक् भावना के साथ जिनेंद्र भगवान का अभिषेक करता है, उसके जीवन में पुण्य का संचय होता है। यही पुण्य आगे चलकर आध्यात्मिक उन्नति, वैभव, सम्मान और श्रेष्ठ जीवन का कारण बनता है।

उन्होंने कहा कि यदि जीव सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सोलह कारण भावनाओं की आराधना करता है, तो वह तीर्थंकर प्रकृति के बंध का अधिकारी बन सकता है। ऐसे पुण्य के प्रभाव से आगे की पर्यायों में जन्माभिषेक, राज्याभिषेक, दीक्षाभिषेक और अंततः जिनाभिषेक जैसे परम सौभाग्य प्राप्त होते हैं।

बाहरी आडंबर नहीं, भावों की शुद्धता जरूरी

प्रवचन में मुनिश्री ने भावशुद्धि का महत्व समझाते हुए कहा कि धर्म का वास्तविक संबंध बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि अंतर्मन की पवित्रता से है। यदि मन में क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष भरे हों तो बाहरी पूजा का अपेक्षित फल नहीं मिलता। प्रत्येक व्यक्ति को अपने भावों को निर्मल बनाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। भगवान के वीतराग स्वरूप का चिंतन करते हुए स्वयं को राग-द्वेष से मुक्त बनाने का संकल्प लेना ही सच्ची आराधना है।

बड़े बाबा को आंखों से नहीं, हृदय से देखें

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि बड़े बाबा के दर्शन केवल नेत्रों से न करें, बल्कि उन्हें अपने हृदय में उतारें। जब भगवान का वीतराग स्वरूप जीवन का आदर्श बनता है, तब विचार, व्यवहार और चरित्र में भी परिवर्तन आने लगता है। उन्होंने कहा कि तीर्थ केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन की प्रयोगशाला है। जो व्यक्ति यहां से केवल प्रसाद लेकर लौटता है, वह बहुत कम लेकर जाता है; लेकिन जो भगवान के आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प लेकर लौटता है, वही वास्तविक तीर्थयात्री है।

जिनवाणी और आत्मचिंतन से मन की स्वच्छता

मुनिश्री ने कहा कि बाहरी स्वच्छता जितनी आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक मन की स्वच्छता है। शरीर को जल से स्वच्छ किया जा सकता है, लेकिन मन को जिनवाणी, आत्मचिंतन, स्वाध्याय और साधना से ही निर्मल बनाया जा सकता है। उन्होंने प्रत्येक श्रद्धालु से प्रतिदिन कुछ समय धर्मचिंतन, स्वाध्याय और आत्मनिरीक्षण के लिए निकालने का आग्रह किया।

तीर्थयात्रा जीवन की दिशा बदलने का अवसर

मुनिश्री ने कहा कि तीर्थक्षेत्र पर आने का उद्देश्य केवल पुण्य संचय नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदलना होना चाहिए। यदि बड़े बाबा के चरणों में आकर व्यक्ति के भीतर श्रद्धा, विनय, करुणा, क्षमा और आत्मकल्याण की भावना जागृत हो जाए, तो यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। धर्म का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब वह व्यक्ति के व्यवहार, संस्कार और जीवनशैली में उतरता है।

देशभर से पहुंच रहे श्रद्धालु

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्र कमेटी के प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में प्रतिदिन प्रातःकालीन अभिषेक, पूजन एवं धर्मसभा में देशभर से आए श्रद्धालु बड़ी संख्या में सहभागिता कर रहे हैं। बड़े बाबा श्री आदिनाथ भगवान की भक्ति, मंगलमय मंत्रोच्चार और संतों की अमृतवाणी से सम्पूर्ण सिद्धक्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित हो उठा है।

कमेटी ने किया धर्मलाभ का आग्रह

कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष चंद्रकुमार सराफ, चातुर्मास समिति संयोजक आरके जैन सहित कमेटी के सभी पदाधिकारी एवं सदस्यों ने श्रद्धालुओं से इस पुण्य अवसर का लाभ लेने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि बड़े बाबा के चरणों में अभिषेक, पूजन एवं जिनवाणी श्रवण के माध्यम से अपने जीवन को धर्ममय और मंगलमय बनाने का प्रयास करना चाहिए।