मुरैना (श्रीफल साथी मनोज जैन नायक)। परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि “संसार में सुख और दर्पण में मुख है नहीं, सिर्फ दिखता है।” उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार दर्पण में दिखाई देने वाला चेहरा वास्तविक चेहरा नहीं, बल्कि उसका प्रतिबिंब होता है, उसी प्रकार संसार में दिखाई देने वाला विषय-सुख भी वास्तविक और स्थायी सुख नहीं है।
जैन दर्शन के अनुसार संसार का सुख क्षणिक, पराधीन और परिवर्तनशील है, जबकि वास्तविक सुख आत्मा के भीतर विद्यमान है।
दर्पण के प्रतिबिंब जैसा है संसार का सुख
आचार्यश्री ने कहा कि दर्पण में चेहरा दिखाई देता है, लेकिन उस प्रतिबिंब को छुआ नहीं जा सकता। इसी प्रकार धन, वैभव, प्रतिष्ठा, पद, परिवार और इंद्रियों के विषयों से मिलने वाला सुख दिखाई तो बड़ा देता है, लेकिन स्थायी नहीं होता। आज जो सुख प्रतीत हो रहा है, वही कल दुख का कारण बन सकता है।
बुद्धिमान व्यक्ति दिखाई देने वाले सुख के पीछे भागने के बजाय शाश्वत सुख की खोज करता है।
सुख का वास्तविक स्रोत आत्मा में
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन में आत्मा को अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य का स्वामी बताया गया है। आत्मा का स्वभाव ही सुखमय है, लेकिन कर्मों के आवरण के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है।
उन्होंने कस्तूरी मृग का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार कस्तूरी मृग अपनी नाभि में स्थित सुगंध को जंगल में खोजता रहता है, उसी प्रकार संसार का जीव अपने भीतर स्थित आत्मिक आनंद को भूलकर बाहरी पदार्थों में सुख तलाशता है।
वस्तु में नहीं, परिणामों में है सुख-दुख
आचार्यश्री ने कहा कि यदि धन ही सुख का कारण होता तो धनवान कभी दुखी नहीं होता। यदि सुंदर शरीर सुख देता तो वृद्धावस्था दुखदायी नहीं लगती और यदि प्रतिष्ठा ही सुख देती तो प्रसिद्ध व्यक्ति कभी चिंतित नहीं होता।
वस्तु वही रहती है, लेकिन हमारे भाव बदलते ही सुख-दुख का अनुभव बदल जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि सुख वस्तु में नहीं, बल्कि हमारे परिणामों में है।
इच्छाओं का अंतहीन सिलसिला
उन्होंने कहा कि इच्छा स्वयं सुख को जन्म नहीं देती। इच्छा की पूर्ति के बाद कुछ समय के लिए मन की बेचैनी शांत होती है और जीव उसे सुख समझ लेता है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इच्छाओं का यही अंतहीन सिलसिला मनुष्य को संसार के चक्र में बांधे रखता है।
जैन संतों ने इच्छाओं के निरोध को सच्चे सुख की दिशा में पहला कदम बताया है।
परिस्थितियां बदलती हैं, आत्मा नहीं
आचार्यश्री ने दर्पण का उदाहरण देते हुए कहा कि दर्पण सामने होगा तो प्रतिबिंब दिखाई देगा और दर्पण हटते ही प्रतिबिंब भी समाप्त हो जाएगा, लेकिन वास्तविक चेहरा वहीं रहता है।
इसी प्रकार संसार की परिस्थितियां भी बदलती रहती हैं। कभी सम्मान मिलता है तो कभी अपमान, कभी लाभ होता है तो कभी हानि और कभी सुख आता है तो कभी दुख। आत्मा इन परिस्थितियों से अलग है। जो व्यक्ति अपने आत्मस्वरूप को पहचान लेता है, वह परिस्थितियों के आने-जाने से विचलित नहीं होता।
मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने समझाया सम्यग्दर्शन का अर्थ
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि सम्यग्दर्शन का अर्थ वास्तविकता को सही रूप में देखना है। संसार को संसार और आत्मा को आत्मा समझना ही सही दृष्टि है।
उन्होंने कहा कि जब तक जीव शरीर को ही अपना स्वरूप मानता रहेगा, तब तक वह बाहरी सुख-दुख में उलझा रहेगा। लेकिन जब उसे यह अनुभूति होने लगेगी कि “मैं शरीर नहीं, चेतन आत्मा हूं”, तब उसके जीवन की दिशा बदलने लगेगी।
आत्मचिंतन से जीवन में आएगा विवेक
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को प्रतिदिन स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि जिस सुख के पीछे वह भाग रहा है, क्या वह वास्तव में स्थायी है? जिस वस्तु के लिए वह क्रोध, लोभ, मोह और मान कर रहा है, क्या वह वस्तु उसके साथ जाएगी?
मृत्यु के समय न धन साथ जाएगा, न पद, न प्रतिष्ठा और न शरीर। साथ जाएगा तो केवल आत्मा और उसके कर्म।
संग्रह नहीं, त्याग में है वास्तविक सुख
मुनिश्री ने कहा कि परिग्रह जितना बढ़ता है, चिंता उतनी ही बढ़ती जाती है। जिसके पास कम है वह अधिक पाने की चिंता करता है और जिसके पास अधिक है वह उसे बचाने की चिंता करता है। इस प्रकार दोनों ही चिंतित रहते हैं।
वास्तविक सुख संग्रह में नहीं, त्याग में है; भोग में नहीं, संयम में है और दूसरों को जीतने में नहीं, स्वयं पर विजय प्राप्त करने में है।
आत्मविजय को दिया भगवान महावीर ने महत्व
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने बाहरी विजय से अधिक आत्मविजय को महत्व दिया। जिसने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली, उसने बड़ा युद्ध जीत लिया। जिसने लोभ को नियंत्रित कर लिया, उसने बड़ी संपत्ति प्राप्त कर ली। जिसने मोह को कम कर लिया, उसके जीवन में शांति आने लगी।
जो आत्मा के स्वरूप को जान लेता है, उसके लिए संसार के आकर्षण धीरे-धीरे फीके पड़ने लगते हैं।
‘मैं कौन हूं?’—यह प्रश्न जीवन बदल सकता है
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि दर्पण में चेहरा देखते समय एक क्षण स्वयं से प्रश्न करें—“मैं कौन हूं?”
क्या मैं यह शरीर हूं? क्या मैं यह नाम हूं? क्या मैं यह पद हूं? क्या मैं यह धन हूं? ये सभी परिवर्तनशील हैं। वास्तविकता यह है कि मैं चेतन आत्मा हूं, जिसका स्वरूप ज्ञान और दर्शन है।
इस प्रकार का आत्मचिंतन जीवन में वैराग्य और विवेक को जन्म देता है।
आत्मसुख की पहचान से समाप्त होगी संसार की दौड़
धर्मसभा में संदेश दिया गया कि यदि मनुष्य यह समझ ले कि संसार का सुख केवल प्रतिबिंब है और वास्तविक सुख आत्मा में है, तो उसकी बाहरी सुख की दौड़ धीरे-धीरे समाप्त होने लगेगी।
वह धन कमाएगा, लेकिन धन को अपना स्वामी नहीं बनाएगा। परिवार में रहेगा, लेकिन मोह में नहीं डूबेगा। सम्मान मिलने पर अहंकार नहीं करेगा और अपमान मिलने पर टूटेगा नहीं।
27 एवं 28 अगस्त को रक्षा बंधन विधान
धर्मनगरी मुरैना में 27 एवं 28 अगस्त को रक्षा बंधन विधान का आयोजन किया जाएगा। धार्मिक आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है और बड़ी संख्या में धर्मावलंबियों के सहभागी होने की संभावना है।




