सनावद। जैन धर्म में उपवास को आत्मशुद्धि, संयम और कर्मनिर्जरा की साधना माना गया है। दृढ़ संकल्प एवं इंद्रिय-विषयों पर नियंत्रण से की गई तपस्या समाज के लिए प्रेरक उदाहरण बनती है। इसी भाव के साथ श्रीमती ज्योति बाला पवनकुमार धनोते ने 32 उपवास की कठिन साधना पूर्ण की

चौदह वर्षों से निरंतर तप आराधना
सन्मति जैन काका ने बताया कि ज्योति बाला धनोते विगत चौदह वर्षों से प्रतिवर्ष सोलहकारण व्रत के अंतर्गत 32 उपवास की तपस्या कर रही हैं। इस वर्ष उन्होंने राजस्थान के सीकर में नगर गौरव वात्सल्य वारिधि आचार्य रत्न श्री वर्धमानसागर जी महाराज के सान्निध्य में अपनी उपवास साधना पूर्ण की।
आचार्यश्री के आशीर्वाद एवं सान्निध्य में की गई यह साधना धर्म के प्रति उनकी गहरी आस्था, श्रद्धा और संयम का परिचायक है।
सेवा और संयम से जुड़ा जीवन
ज्योति बाला धनोते नगर में भी साधु-संतों की सेवा तथा उनके आहार-विहार की व्यवस्थाओं में निरंतर सहयोग करती हैं। उन्होंने अब तक अपने जीवनकाल में 1256 उपवासों की तप-साधना की है।
उनकी 32 उपवास की आराधना पर समाजजनों ने खूब-खूब अनुमोदना की और उनके उत्तम स्वास्थ्य तथा निरंतर धर्म-साधना की मंगलकामना की।
श्रीफल साथी : सन्मति जैन काका, सनावद





