दिल्ली। ऋषभोदय तीर्थ, कड़कड़डूमा में विराजमान दिगंबर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि राग व्यक्ति स्वयं करता है और द्वेष भी स्वयं करता है। राग-द्वेष में अंधा व्यक्ति हमेशा अनर्थ ही करता है। अनर्थ से बचना है तो अपने अर्थ अर्थात लक्ष्य पर दृष्टि केंद्रित करनी चाहिए।
योग्यता का सदुपयोग करें
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी योग्यता का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। जो योग्यता, शक्ति और बुद्धि प्राप्त हुई है, उसका प्रयोग रचनात्मक कार्यों में किया जाना चाहिए। अपनी शक्ति और ज्ञान को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए, क्योंकि जीवन का प्रत्येक पल मूल्यवान है।
उन्होंने कहा कि शक्ति, ज्ञान और बुद्धि को विपरीत सोच एवं बुरे कार्यों में लगाने के बजाय सृजन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
आय अधिक, व्यय कम रखें
पट्टाचार्य श्री ने धन के सदुपयोग पर भी जोर देते हुए कहा कि धन का व्यर्थ व्यय नहीं करना चाहिए। सृजन की ओर बढ़ें और विनाश से बचें। विचारशील बनकर धन का उपयोग जनकल्याण के कार्यों में करें।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति का धन किसी के प्राणों की रक्षा कर सकता है और वही धन किसी के प्राणों के लिए घातक भी बन सकता है। सुखी जीवन जीना है तो आय से व्यय कम रखना चाहिए। जिसकी आय अधिक और व्यय कम होगा, वह अनेक कष्टों से बच सकेगा।
कैसा हो आदर्श शिष्य
पट्टाचार्य श्री ने आदर्श शिष्य के गुण बताते हुए कहा कि शिष्य विनयवान, स्थिर, ज्ञान-पिपासु, विवेकी, आज्ञाकारी, अल्पभोजी, नैतिक और पापभीरु होना चाहिए।
जो गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाए और गुरु के विश्वास को न तोड़े, वही सच्चा शिष्य होता है। शिष्य का आचरण ऐसा होना चाहिए कि वह अपने गुरु की शिक्षाओं और परंपरा को मजबूत बनाए
गुरु में होने चाहिए ये गुण
उन्होंने कहा कि गुरु का चयन भी विवेकपूर्वक होना चाहिए। जो ज्ञानी, क्षमाशील, परिग्रहशून्य, धर्मवान, भक्तवत्सल, धीर-वीर-गंभीर, विवेकी, तपस्वी, स्वाध्यायशील, ध्यानशील और शीलवान हो तथा अपने शिष्य का उत्कर्ष चाहता हो, वही सच्चा गुरु होता है।
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि जो तोड़े नहीं, बल्कि जोड़े, वही सच्चा योगी है।
‘वस्तुत्व महाकाव्य’ के ऑडियो का विमोचन
धर्मसभा के अवसर पर ‘वस्तुत्व महाकाव्य’ के ऑडियो का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं एवं धर्मप्रेमी समाजजनों ने धर्मसभा का लाभ लिया।



