सनावद। वर्तमान में अतिशय क्षेत्र रहली, पटनागंज (मध्य प्रदेश)में विराजमान मुनि श्री प्रयोग सागर जी महाराज ने विधिपूर्वक केशलोंच किया। इस संबंध में जानकारी देते हुए सन्मति जैन काका ने बताया कि दिगंबर साधु समस्त परिग्रह से रहित होते हैं तथा अपने पास केवल मयूर पंख से बनी पिच्छी और शास्त्र रखते हैं। बालों को हटाने के लिए वे उस्तरा आदि अपने पास नहीं रख सकते और न ही इसका प्रयोग कर सकते हैं। चूंकि साधु स्वावलंबी होते हैं और उनकी चर्या सिंह के समान एकाकी होती है, इसलिए बाल हटाने के लिए किसी का सहारा भी नहीं लेते। इसलिए वे अपने हाथों से बालों को नोंच कर उखाड़ते हैंl इस क्रिया को केशलोंच कहा जाता है।
केश लोच परजीवी सूक्ष्म जीवों की विराधना होती है
केशलोंच परिषह सहन करने के लिए भी आवश्यक है। दिगंबर मुनि महाव्रती होते हैं और 22 परिषह को सहज ही सहन करते हैं तथा 28 मूलगुणों का पालन करते हैं। जिसमें हाथों से केशलोंच करना एक आवश्यक क्रिया है। केशलोंच करने से अनेक परजीवी सूक्ष्म जीवों की विराधना होती है। जिसके प्रायश्चित स्वरूप मुनि महाराज उस दिन निराहार रहकर उपवास भी रखते हैं।
मुनि स्वयं अभय होते हैं और अभय ही देते हैं
दिगंबर मुनि अहिंसा की जीवंत छवि होते हैं, जिनसे किसी भी जीव को किसी तरह का कोई भय नहीं रहता। मुनि स्वयं भी अभय होते हैं और दूसरों को भी अभय ही प्रदान करते हैं। इस शुभ अवसर पर बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित थे, जिन्होंने मुनिश्री के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।





